आशीर्वाद की पुरवाइयाँ (छंदमुक्त) -डॉ. रशीद ग़ौरी
हर रात आवाज़ देकर बुलाती हैं घर की दीवारें, खिड़कियाँ-दरवाज़े। झूमर सा उजिया…
हर रात आवाज़ देकर बुलाती हैं घर की दीवारें, खिड़कियाँ-दरवाज़े। झूमर सा उजिया…
हिंदी साहित्य का आदिकाल जहाँ एक तरफ राजाओं के युद्धों और दूसरी तरफ नाथ-सिद्धों की कठ…
कल नहीं जब मैं रहूँगा याद आऊँगा। मौन हो गुमसुम रहा समझा गया चुप्पा, सबकी नज…
अतुल कल रात्रि अपनी पत्नी व बच्चों को वापस लाने ट्रेन से निकला था। सुबह माँ ममता ने …
स्वयं को ही मैं दुर्बल कर रहा हूँ, ये कैसे प्रश्न को हल कर रहा हूँ। मैं इंसाँ हूँ, क…
हिंदी साहित्य का आदिकाल केवल राजाओं के युद्धों और दरबारी काव्यों तक सीमित नहीं था, ब…
मुझको ऐसी मिली है सज़ा प्यार में हो गई क़ैद से ज्यूँ रिहा प्यार में। एक दिन वो फ़साना ह…
हिंदी साहित्य का आदिकाल जहाँ एक तरफ राजाओं के शौर्य और युद्धों के वर्णन से भरा हुआ थ…
स्त्री होना केवल एक जैविक घटना नहीं है; वह एक गहरी दार्शनिक अवस्था है। एक ऐसी अवस्था…
मोहब्बत के तवाज़ुन का कोई आला नहीं होता, जो जाँ दे इश्क़ में उससे कोई बाला नहीं होता…
दू गो सतबा भाई बाप के लहास के आग देबे के लेल लरइत रहे । भर गांओ के लोक स स…
जो पाँच सौ रुपये का, हिसाब तक नहीं जानती। वह महीने के वेतन को, क्या समझ पाती! उसे तो…
हमारे प्यार की बातें हैं और हम-तुम हैं, बहुत हसीन फ़िज़ाएँ हैं और हम-तुम हैं। वफ़…
हिंदी साहित्य का आदिकाल (वीरगाथा काल) भारतीय इतिहास के एक ऐसे दौर की गवाही देता है, …
मैं गाँव की नारी हूँ— अपने घर-आँगन की धुरी, अनगिनत ज़िम्मेदारियों के चक्र में निरंतर…
“ज़ोरदार तालियों से स्वागत कीजिए श्री 'के' का, जिन्हें इस वर्ष के 'एंट…
ओ बारिश! जब तुम बरसना कहीं, थोड़ा बरस जाना मुझ पर भी। तुम बरसती हो पहाड़ों पर, जंगलो…
तेरे मख़मली लफ़्ज़ों का दीवान रखा हूँ, शायद भूल गई, पर निशान रखा हूँ। वे फूल जो…
युवा देश का कहाँ जा रहा, क्या जा रहा किसी गर्त में? मुँह में गुटका, हाथ में सिगरेट, …
पाबंदी की दीवारों के भीतर कुनमुनाती, ठुनकती, तड़पती पीड़ा के अहसास को नहीं समझ …
साँझ ढली अब छोड़ समुंदर, लौट मछेरे। सूरज भी अब लौट रहा घर, लौट मछेरे। सोन मछरिया मोह…
भारतीय साहित्याकाश में जब भी आम आदमी, किसान, शोषित और वंचित समाज की पीड़ा को अभिव्यक…
—विभा रानी श्रीवास्तव दिन की चुभती हुई धूप की जगह अब एक ठंडी, मखमली हवा ने ले ली थी।…
सुनकऽ बातो हिआं न अइले तूं। आइकल दिल कहाँ लगइले तूं। एक सूरत बनल रहे मन में, कोन…
आबले दिल पर पड़े जो उनको सहलाएगा कौन, ये है मरुथल फूल इसमें अब खिला पाएगा कौन। हर …
हिंदी साहित्य का आधुनिक काल जब अपनी जड़ताओं को छोड़कर भावों की सघनता और अंतर्मुखी अन…
“मेरे माता-पिता को कुछ मत कहिए।” ममता दबी ज़बान से बोली और महाभारत हो गया। बाबूजी …
शाम ढल रही थी— आँगन में धूप की आख़िरी रेखा चुपचाप सिमट रही थी, और उसी को थामे एक छोट…
आँसू... अब नहीं बहते आँखों से, कि इसकी ज़बाँ सबको पढ़नी नहीं आती। सच... कहना तो मुश्…
हमारे सामने जब माहताब होता है किसी के हाथ का पत्थर गुलाब होता ह…
तू कब तक सहती रहेगी, ये अभद्र टिप्पणियाँ? तू कब तक देखती रहेगी, अस्मिता की ऐसी धज्जि…