मैं गाँव की नारी हूँ—
अपने घर-आँगन की धुरी,
अनगिनत ज़िम्मेदारियों के चक्र में
निरंतर घूमती रहती हूँ।
मन में इच्छाओं का अथाह समंदर लिए
अपने आज को अर्पित कर देती हूँ
और जीती रहती हूँ
बस कल की प्रतीक्षा में।
हाँ, कुछ स्त्रियाँ अपवाद भी होती हैं,
जो अपने सपनों को पंख देती हैं;
क्षितिज लाँघकर
तारों तक पहुँच जाती हैं।
हम जैसी साधारण नारियाँ तो
बस निहारती रह जाती हैं—
शून्य में टिमटिमाते उन सितारों को,
और जीती रहती हैं
बस कल की प्रतीक्षा में।
खुली आँखों से सपने बुनना तो दूर,
बंद पलकों में भी कहाँ उतरते हैं स्वप्न!
दिनभर की थकान से बोझिल नयन
बस एक बिस्तर तलाशते हैं;
नींद और बेहोशी के बीच
बहुत कम दूरी रह जाती है।
रिश्तों की असंख्य डोरियों में
स्वयं को बाँधे हुए,
और जीती रहती हूँ
बस कल की प्रतीक्षा में।
अपने बच्चों में ही
अपना प्रतिबिंब खोजती हूँ,
उनकी आँखों में
अपने अधूरे सपनों की चमक देखती हूँ।
अधिकारों की भाषा से
बहुत परिचित नहीं हूँ मैं,
कर्तव्यों का पाठ ही
जीवन भर पढ़ती आई हूँ।
फिर भी हर परिस्थिति में
होंठों पर मुस्कान सजा लेती हूँ
और जीती रहती हूँ
बस कल की प्रतीक्षा में।
कभी-कभी सोचती हूँ—
क्या मेरा भी कोई सपना था?
क्या मेरी भी कोई उड़ान थी?
फिर चूल्हे की आँच, खेतों की मेड़
और घर की पुकार
मुझे वर्तमान में लौटा लाती है।
मैं फिर अपने हिस्से का जीवन
चुपचाप जीने लगती हूँ
और जीती रहती हूँ
बस कल की प्रतीक्षा में।
मैं गाँव की नारी हूँ—
त्याग की मिट्टी से गढ़ी,
संघर्ष की धूप में तपकर निखरी।
मेरे मौन में भी
एक पूरा इतिहास साँस लेता है;
मैं टूटती नहीं, बिखरती नहीं,
हर दिन स्वयं को समेटकर
फिर खड़ी हो जाती हूँ
और जीती रहती हूँ
बस कल की प्रतीक्षा में।
-रंजनालता,
समस्तीपुर (बिहार)