हिंदी साहित्य का आदिकाल (वीरगाथा काल) भारतीय इतिहास के एक ऐसे दौर की गवाही देता है, जहाँ तलवारों की खनक के बीच काव्य की रसधार बहती थी। इस कालखंड के सर्वश्रेष्ठ और युगप्रवर्तक रचनाकार महाकवि चंदबरदाई (12वीं सदी) माने जाते हैं। उन्हें हिंदी साहित्य का 'प्रथम महाकवि' और उनकी अमर रचना 'पृथ्वीराज रासो' को हिंदी का 'प्रथम महाकाव्य' होने का गौरव प्राप्त है। चंदबरदाई केवल एक दरबारी कवि नहीं थे, बल्कि वे दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान के अभिन्न मित्र, सामंत और युद्ध-कला में निपुण वीर सैनिक भी थे।
आइए, आज 'बोधायन पत्रिका' के माध्यम से हम आदिकालीन चेतना के इस महाशिल्पी के शब्द-सामर्थ्य और उनकी प्रासंगिकता को गहराई से समझते हैं।
चंदबरदाई की कीर्ति का मुख्य आधार 'पृथ्वीराज रासो' है। यह ढाई हजार पृष्ठों का एक विशाल ग्रंथ है, जिसमें 69 अध्याय (समय) और 68 प्रकार के छंदों (जैसे छप्पय, दूहा, तोमर, त्रोटक) का अद्भुत प्रयोग हुआ है। इसमें वीर रस और श्रृंगार रस का ऐसा बेजोड़ समन्वय है, जो पूरे मध्यकालीन साहित्य में विरल है।
काव्य पंक्ति (युद्ध वर्णन):
बज्जिय विरद दुंदुभी, चमक्किय चरक्किय चहुआन।
उठ्ठिय राज पृथीराज, बाग मनहुं साहनु सान॥
भावार्थ: जब युद्ध के नगाड़े और दुंदुभियाँ बज उठती हैं, तब चौहान वीर पृथ्वीराज के भीतर शौर्य की बिजली चमक उठती है। राजा पृथ्वीराज युद्ध के मैदान में इस तरह उठ खड़े होते हैं, मानो किसी भूखे सिंह ने अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए हुंकार भरी हो।
चंदबरदाई केवल युद्ध का वर्णन नहीं करते थे, बल्कि संकट के समय अपनी वाक्-पटुता और काव्य-बुद्धि से इतिहास बदल देने की क्षमता रखते थे। जब मुहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाकर उनकी आँखें निकाल दी थीं, तब चंदबरदाई ने अपनी काव्य-बुद्धि से सुल्तान की सटीक दूरी बताकर पृथ्वीराज से शब्दभेदी बाण चलवाया था। उनका वह दोहा आज भी राष्ट्रप्रेम और इतिहास की अमर धरोहर है:
दोहा:
चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान।
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान ।।
भावार्थ: कवि ने बंदीगृह में बैठे राजा पृथ्वीराज को सांकेतिक भाषा में गोरी के बैठने का सटीक स्थान बताया कि—चार बांस, चौबीस गज और आठ उंगली की दूरी व ऊंचाई पर सुल्तान बैठा है; हे चौहान! अब अचूक निशाना लगाओ, चूकना मत। इस एक दोहे ने भारतीय इतिहास में शौर्य की पराकाष्ठा तय कर दी।
आदिकाल में वीरगाथाओं के लिए 'डिंगल' (राजस्थानी मिश्रित अपभ्रंश) और प्रेम के लिए 'पिंगल' (ब्रजभाषा मिश्रित अपभ्रंश) शैली का प्रयोग होता था। चंदबरदाई इन दोनों विधाओं के सिद्धहस्त कवि थे। उनकी रचनाओं ने आगे चलकर भक्ति काल और रीतिकाल की भाषा (ब्रजभाषा) की सुदृढ़ पृष्ठभूमि तैयार की।
महाकवि चंदबरदाई का काव्य हमें सिखाता है कि साहित्य केवल एकांत में बैठकर रचने की वस्तु नहीं है, बल्कि देश और संस्कृति पर संकट आने पर कलम को तलवार की तरह चलाने का नाम भी साहित्य है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ठीक ही लिखा है कि "ये हिंदी के प्रथम महाकवि माने जाते हैं और इनका पृथ्वीराज रासो हिंदी का प्रथम महाकाव्य है।" आज की पीढ़ी को अपनी ऐतिहासिक और साहित्यिक जड़ों से जोड़ने के लिए चंदबरदाई का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।
साभार और संदर्भ सूची :
स्रोत ग्रंथ: पृथ्वीराज रासो (मूल पाठ, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी)।
ऐतिहासिक संदर्भ: आचार्य रामचंद्र शुक्ल कृत 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (आदिकाल/वीरगाथा काल)।
विशेष आभार: यह आलेख 'बोधायन पत्रिका' के माध्यम से हमारी प्राचीन राष्ट्रीय चेतना और हिंदी के प्रथम महाकवि चंदबरदाई के प्रति सादर साभार समर्पित है।