जसिंता केरकेट्टा की कविताओं में मानवीय संवेदना (शोध - पत्र) - रुपक कुमार

   चित्र: प्रसिद्ध आदिवासी कवयित्री व लेखिका जसिंता केरकेट्टा    
शोध-सार (Abstract):
जसिंता केरकेट्टा ने अपनी कविताओं में मानवीय संवेदना को प्रमुख विषय बनाकर काव्य-रचना की है। उनकी कविताओं में जनसाधारण के दुख-दर्द, सुख-दुख, आशा, आकांक्षाएँ, भूख, शोषण, उत्पीड़न, प्रेम, वियोग, प्रतीक्षा तथा अधिकार जैसे जीवन-संबंधी प्रश्न केंद्रीय भाव के रूप में उपस्थित हैं। पूँजीवाद, औद्योगीकरण, बाज़ारवाद और अवसरवादी राजनीति के बढ़ते प्रभाव ने मनुष्य के जीवन को संघर्षपूर्ण बना दिया है। आज मनुष्य ने भौतिक सुख-सुविधाओं को अपने जीवन का अभिन्न अंग मान लिया है और उसे इनके बिना जीवन की कल्पना भी असंभव प्रतीत होती है। इसी प्रवृत्ति के कारण वह प्राकृतिक संसाधनों का निरंतर दोहन और विनाश कर रहा है।
बीज शब्द (Keywords): आदिवासी, स्त्री, अस्मिता, प्रकृति, मानवता, व्यवहार, विकास, विघटन, शहर, गाँव, शोषण।

जसिंता केरकेट्टा की कविताओं से स्पष्ट होता है कि उनकी रचनाएँ गहरे जीवनानुभवों से उपजी हैं। उन्होंने जिन पीड़ाओं को स्वयं भोगा और महसूस किया है, उन्हीं अनुभूतियों को अपनी कविताओं में सशक्त रूप से अभिव्यक्त किया है। वे कविता के माध्यम से बेबाकी के साथ प्रतिरोध का स्वर मुखर करती हैं। विश्व साहित्य में कविता वह विधा रही है, जिसके माध्यम से प्रतिरोध की सबसे प्रभावशाली अभिव्यक्ति सामने आई है। साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कविता कम शब्दों में गहन संवेदना और जीवन-सत्य को अधिक प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है। वह किसी भी जटिल विषय को सहजता से प्रस्तुत करते हुए सत्ता तथा अन्य मानव-विरोधी शक्तियों की तीक्ष्ण दृष्टि से समीक्षा करती है।
जसिंता केरकेट्टा अपनी पुस्तक 'ईश्वर और बाज़ार' की भूमिका में लिखती हैं—
"कविताएँ लिखते हुए मैंने महसूस किया है कि कैसे ये आदमी को मशीन से मनुष्य बनाती हैं। एक ऐसी जगह ले जाती हैं, जहाँ मेरा 'मैं' कहीं गुम हो जाता है और वह बहुतों के 'मैं' के भीतर समाकर 'हम' सा कुछ महसूस करता है। कविताओं ने मुझे भीतर से शून्य होना सिखाया है। इसकी वजह से मेरे भीतर कविताओं के एवज में कुछ पाने की लालसा और प्रतिरोध की कविता लिखते हुए मारे जाने का डर- दोनों ही समाप्त हो गए हैं। इन कविताओं ने ही मुझे जंगल-जंगल, पहाड़-पहाड़, गाँव-गाँव घुमाते हुए ज़मीन के लोगों के लिए लिखने, जीने और एक दिन मर जाने का जज़्बा दिया है।""
इसी प्रकार 'प्रेम में पेड़ होना' की भूमिका में वे लिखती हैं—
"अन्त में इतना ही कि जीवन से प्रेम के खो जाते ही कविताएँ भी एक दिन खो जाएँगी। वे सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रेम की ताक़त के कारण ही बची हुई हैं। कविताओं ने मुझे बेहतर इंसान बनाया है और यह विश्वास भी दिलाया है कि प्रेम में पेड़ होना सम्भव है।""
जसिंता केरकेट्टा मूलतः आदिवासी समाज से आती हैं। इसलिए उनकी कविताओं में आदिवासी जीवन, संस्कृति, संघर्ष और संवेदनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी रचनाएँ आदिवासी समाज के जीवनानुभवों, प्रकृति से उसके गहरे संबंध तथा उसके सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ को प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत करती हैं। आदिवासी काव्य-अभिव्यक्ति के संदर्भ में कहा है—
"अपनी तीव्र भावनाओं को और संवेदनाओं को आदिवासी नृत्य की लय से लोकगीतों में साकार करते हैं। अपने पर्यावरण के जड़-चेतन तत्वों से उनके रंगों का प्रयोग मेल खाता है। उनका वास्तविक जीवन प्रतिकूलताओं से भरा दुःख और यातनापूर्ण होने पर भी वे अपनी अन्न शक्ति के स्रोतों से संभल पाते हैं। तथा गीत, संगीत और नृत्य में अपने सुख की अभिव्यक्ति करते हैं।"
वर्तमान समय में मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे अत्यधिक भाग रहा है। आज वह अन्य मनुष्यों की अपेक्षा अपने व्यक्तिगत सुख और सुविधाओं को अधिक महत्त्व देता है। इस अंधी दौड़ में वह प्राकृतिक संसाधनों की बिल्कुल भी परवाह नहीं करता और उनके संरक्षण के प्रति भी उदासीन बना हुआ है। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रश्न पर सरकारें भी अनेक बार उदासीन और लापरवाह दिखाई देती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे पर्यावरण-संरक्षण की अपेक्षा पूँजीपतियों के हितों को अधिक प्राथमिकता देती हैं। उनके आर्थिक लाभ और मुनाफ़े के लिए निरंतर जंगलों की कटाई की जा रही है, नदियाँ प्रदूषित और नष्ट हो रही हैं तथा वायु इतनी दूषित हो चुकी है कि अनेक स्थानों पर वह विषैली होती जा रही है। इन गंभीर पर्यावरणीय संकटों के बावजूद समाज और सत्ता का पर्याप्त ध्यान इस ओर नहीं है। उनकी प्राथमिकता केवल अधिकाधिक भौतिक सुख-सुविधाओं का अर्जन रह गई है। परिणामस्वरूप, उपभोक्तावादी प्रतिस्पर्धा और भौतिक सुखों की अंधी दौड़ के कारण मानवीय संवेदनाएँ, नैतिक मूल्य और सामाजिक उत्तरदायित्व निरंतर क्षीण होते जा रहे हैं।
वर्तमान समय में सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय स्थितियाँ निरंतर जटिल होने के साथ-साथ अव्यवस्थित भी होती जा रही हैं। ऐसी परिस्थितियों में जसिंता केरकेट्टा एक संयमित, शोषण-मुक्त और संतुलित समाज की स्थापना की आकांक्षा रखती हैं। उनकी कविताएँ मनुष्यों के बीच मानवीय संबंधों की पुनर्स्थापना का प्रयास करती हैं। वे उस मनुष्य की पीड़ा को स्वर देती हैं, जो बनावटीपन, स्वार्थ और असंवेदनशील व्यवहार से आहत है। साथ ही, वे प्रकृति और मनुष्य के बीच उत्पन्न द्वंद्व को समाप्त कर दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देती हैं। इसी संदर्भ में प्रतिष्ठित आदिवासी चिंतक वंदना टेटे कहती हैं—
"आदिवासी दर्शन प्रकृतिवादी है। आदिवासी समाज धरती, प्रकृति और सृष्टि के ज्ञात-अज्ञात निर्देश, अनुशासन और विधान को सर्वोच्च स्थान देता है। उसके दर्शन में सत्य-असत्य, सुन्दर-असुन्दर, मनुष्य-अमनुष्य जैसी कोई अवधारणा नहीं है, न ही मनुष्य को उसके बुद्धि विवेक अथवा 'मनुष्यता' के कारण 'महान' मानता है। उसका दृढ़ विश्वास है कि सृष्टि में जो कुछ भी सजीव और निर्जीव है, सब सामान है। न कोई बड़ा है, न कोई छोटा है। न कोई दलित है, न कोई ब्राह्मण। सब अर्थवान है एवं सबका अस्तित्व एक सामान है- चाहे वह एक कीड़ा हो, पौधा हो, पत्थर हो या कि मनुष्य।""
वर्तमान समय में मनुष्य बाज़ारवाद, भौतिक सुख-सुविधाओं, राजनीतिक अंतर्विरोधों और सामाजिक जटिलताओं के बीच उलझ गया है। उसका सहज और स्वाभाविक जीवन निरंतर अधिक अव्यवस्थित तथा कठिन होता जा रहा है। पूँजीवाद और औद्योगीकरण के तीव्र विस्तार ने मानव जीवन को गहराई से प्रभावित किया है। आज वस्तुओं का महत्त्व और मूल्य निरंतर बढ़ रहा है, जबकि मनुष्य का मूल्य और उसकी गरिमा दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है। परिणामस्वरूप, मनुष्य का व्यवहार, रहन-सहन, जीवन-शैली और यहाँ तक कि उसकी आवश्यकताएँ भी बाज़ार द्वारा निर्धारित की जाने लगी हैं। तेज़ी से बदलते इस उपभोक्तावादी परिवेश में मनुष्य के पास धैर्य, संयम और आत्मचिंतन के लिए पर्याप्त समय नहीं रह गया है। इसके कारण उसके आंतरिक जीवन में संवेदनशीलता और नैतिकता का क्षरण हो रहा है तथा अमानवीय प्रवृतियाँ बढ़ती जा रही हैं। व्यक्ति नफ़रत, ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा से भरे वातावरण में जीवन जीने के लिए विवश दिखाई देता है। प्रभुत्ववादी, ब्राह्मणवादी और तानाशाही प्रवृत्तियों से संचालित सत्ता किस प्रकार समाज और मनुष्य के जीवन को प्रभावित करती है, इस संदर्भ में जसिंता केरकेट्टा लिखती हैं—
"मैं दलितों को जाहिल
और आदिवासियों को जानवर समझता हूँ
मुस्लिम और ईसाई देशद्रोही
और इस देश से इन सब की सफ़ाई चाहता हूँ"

यह भाषा समकालीन शासन-सत्ता और पूँजीवादी वर्ग की उस मानसिकता को उजागर करती है, जिसमें व्यक्ति केवल स्वयं को ही केंद्र में रखता है। वह स्वयं को श्रेष्ठ मानता है, श्रेष्ठ घोषित करता है और उसी दृष्टि से संसार को देखने का प्रयास करता है। इसके विपरीत, वह अन्य लोगों को तुच्छ, अयोग्य अथवा मूर्ख समझने लगता है। ऐसी मानसिकता सामाजिक असमानता, वर्चस्व और अमानवीयता को बढ़ावा देती है। जसिंता केरकेट्टा का लेखन सरल, सहज, आत्मानुशासित और गहरी मानवीय संवेदना से संपन्न है। उनकी दृष्टि अत्यंत सजग और मानवीय है, जो अपने समय के सामाजिक यथार्थ को तीक्ष्णता के साथ पहचानती है और मनुष्यता के पक्ष में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराती है। वे अपनी कविताओं के माध्यम से यह स्पष्ट करती हैं कि वर्तमान समय में मनुष्य अपने मन और तन दोनों स्तरों पर मानवीय गुणों से दूर होता जा रहा है तथा धीरे-धीरे एक संवेदनशील मनुष्य के बजाय हिंसा और विनाश के उपकरण में परिवर्तित होता जा रहा है। इसी संदर्भ में वे लिखती हैं—
"तलवार में तब्दील होता आदमी
काट सकता है
आदमी का ही गला
धरती देश जानवर स्त्री
किसी भी बहाने"
वर्तमान समय में राजनीति, बाज़ारवाद, औद्योगीकरण और बढ़ते स्वार्थ ने मनुष्य के जीवन-मूल्यों को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप, मनुष्य दूसरे मनुष्य को संवेदनशील और विवेकशील प्राणी के रूप में नहीं, बल्कि अपने हितों की पूर्ति के साधन के रूप में देखने लगा है। सत्ता, लाभ और वर्चस्व की इस प्रवृत्ति ने अनेक लोगों को हिंसा, दमन और अमानवीय कृत्यों की ओर धकेल दिया है। इस प्रकार, मनुष्य के भीतर की मानवीय संवेदना का स्थान धीरे-धीरे क्रूरता, स्वार्थ और हिंसक मानसिकता लेती जा रही है।
आज बाज़ारीकरण के दौर में आदिवासी समुदाय की अस्मिता पर संकट आ गया है। औद्योगीकरण के चलते आदिवासी समाज से उनके जल, जंगल और ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर उन्हें जंगलों से बेदखल किया जा रहा है। यह हम सब जानते हैं कि मनुष्य के जीवन में जल, जंगल और ज़मीन का कितना महत्त्व है। इनके बिना मनुष्य का जीवन जीना अत्यंत कठिन है। इसलिए इनका मानव जीवन में बहुमूल्य योगदान है। बाज़ारीकरण के दौर में औद्योगीकरण के नाम पर उन आदिवासियों के साथ, जिन्होंने सदियों से जल, जंगल और ज़मीन का संरक्षण किया है, ज़ुल्म, दमन और अत्याचार किए जा रहे हैं। ऐसे—
"कौन करेगा इसकी पड़ताल
कि किसने किया है बारिश को विस्थापित
और कौन खदेड़ना चाहता है इंसानों को
जंगलों से बाहर जानवरों की तरह?"
आज हम देख रहे हैं कि नक्सल-सफ़ाई के नाम पर दिन-दहाड़े निर्दोष आदिवासियों की हत्या कर दी जाती है। आदिवासियों को विभिन्न बहाने और साज़िशों के माध्यम से उनकी ज़मीन से बेदखल करने के प्रयास किए जाते हैं। उनका लगातार शोषण, उत्पीड़न और दमन किया जा रहा है। इस बात को समझने की आवश्यकता है कि भूमंडलीकरण के नाम पर आदिवासी जीवन को गहरा आघात पहुँचा है। बड़े-बड़े सुंदर पहाड़ों को काटकर लंबी सुरंगें बनाई जा रही हैं, रेल की पटरियाँ बिछाई जा रही हैं तथा झरनों, नदियों और नालों को नष्ट करके वहाँ बड़ी-बड़ी खदानें स्थापित की जा रही हैं। इससे उत्पन्न प्रदूषण केवल आदिवासियों के जीवन के लिए ही नहीं, बल्कि गैर-आदिवासियों के जीवन के लिए भी गंभीर ख़तरा बनता जा रहा है। इसके कारण आम लोगों का जीवन भी प्रभावित हो रहा है और प्रदूषण के चलते उन्हें अनेक प्रकार की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।
एक तरह से कहा जाए तो आदिवासियों के साथ जघन्य अत्याचार, शोषण और दमन किया जा रहा है। एक ओर उन्हें जंगलों से बेदखल किया जा रहा है, तो दूसरी ओर महानगरों से भी उन्हें बेदखल करने के लिए विभिन्न प्रकार की साज़िशें रची जा रही हैं। उन्हें हीन दृष्टि से देखा जाता है। आज आदिवासियों का जीवन दाँव पर लगा हुआ है। पूँजीपति वर्ग स्वयं तो सुख और चैन का जीवन जी रहा है, किंतु आदिवासियों, गरीबों और दलितों का जीवन नारकीय बना दिया गया है। आधुनिकीकरण के नाम पर पूँजीपतियों और सरकार के गठजोड़ ने आदिवासियों, गरीबों, मज़दूरों और दलितों का जीवन अत्यंत कठिन बना दिया है। उन्हें उनके मूलभूत अधिकारों से भी वंचित किया जा रहा है। जिन सरकारों की ज़िम्मेदारी इन गरीबों, आदिवासियों, दलितों और मज़दूरों के जीवन को बेहतर बनाना थी, वही आज उनके जीवन को और अधिक कठिन बनाने में लगी हुई हैं। इसके विपरीत, वे सामंतों और पूँजीपतियों को संरक्षण और सुरक्षा प्रदान करती दिखाई देती हैं। इसी संदर्भ में डॉ. भगवान गवहाड़े 'शायनिंग इंडिया' कविता में कहते हैं—
"गरीब किसान और मजदूर/दलित-आदिवासी है मजबूर/भूमंडलीकरण के नाम पर"
भूमंडलीकरण के कारण आज पर्यावरण के सभी घटक संकट में हैं। इसका प्रभाव इतना व्यापक हो गया है कि यह निरंतर बढ़ता जा रहा है। आज पेड़, पहाड़ और नदियाँ सभी विनाश के कगार पर पहुँचते दिखाई दे रहे हैं। वायु और जल दोनों प्रदूषित होते जा रहे हैं, जबकि ये मनुष्य के जीवन की प्राथमिक आवश्यकताएँ हैं। इन गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं को कवयित्री जसिंता केरकेट्टा अपनी कविताओं में प्रभावशाली ढंग से दर्ज करती हैं—
"एक दिन जब सारी नदियाँ
मर जाएँगी ऑक्सीजन की कमी से
तब मरी हुई नदियों में तैरती मिलेंगी
सभ्यताओं की लाशें भी
नदियाँ ही जानती हैं
उनके मरने के बाद आती है
सभ्यताओं के मरने की बारी।"
तथा—
"जब कुछ महसूस नहीं होता
पहले मिट्टी, पानी, पेड़ मारे गए
किसी ने कुछ महसूस नहीं किया
जिन्हें कुछ महसूस नहीं होता
वे बहुत पहले मर चुके होते हैं
बाद में वे सिर्फ़ दफ़नाए जाते हैं।"
इस प्रकार कवयित्री अपनी कविताओं में सभ्यताओं के विनाश का सजीव चित्र प्रस्तुत करती हैं। साथ ही, वे जनता को इसके प्रति सचेत करते हुए उसे सजग और जागरूक होने के लिए प्रेरित करती हैं।
जसिंता केरकेट्टा की सर्जनात्मकता का उद्देश्य तथा उनकी प्रमुख चिंता मानवीयता की रक्षा करना है। वे मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखना चाहती हैं। उनका मानना है कि मनुष्य न किसी से घृणा करे और न किसी का शोषण करे। वे ऐसे समाज की कल्पना करती हैं, जहाँ सामंती मानसिकता का कोई स्थान न हो। सामंती प्रवृत्ति मनुष्य को मनुष्य नहीं, बल्कि एक वस्तु समझती है। वह अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए मनुष्य का अपने स्वाथानुसार उपयोग करती है, उसका शोषण करती है और उसका अनुचित लाभ उठाती है। मानवीयता के महत्त्व को रेखांकित करते हुए जसिंता केरकेट्टा ने अपनी कविताओं की रचना की है। वे लिखती हैं—
"यह शहर एक भ्रम देता है
जुगाली को भी वह काम बताता है
और काम करने वालों का
बारी-बारी से कत्ल कर आता है
और जुगाली करने वाले बैठकर एक साथ
एक स्वर में मुँह चलाते रह जाते हैं"

इस कविता में कवयित्री उन लोगों की पहचान करती हैं, जिनमें सामंती मानसिकता, पूँजीवादी प्रवृत्ति और सत्ता का अहंकार विद्यमान है। वे उन लोगों की ओर संकेत करती हैं, जो हत्या को मानो अपना पेशा समझते हैं। ऐसे लोग संविधान की भावना और मानवीय संवेदनाओं के विरुद्ध जाकर हिंसा का सहारा लेते हैं। वे दोषियों के बजाय निर्दोष स्त्रियों, मज़दूरों, किसानों और गरीबों की खुलेआम हत्या कर देते हैं। जो लोग उनकी सामंती मानसिकता और प्रभुत्व को स्वीकार नहीं करते, वे उनके दमन का शिकार बनते हैं। जसिंता केरकेट्टा अपनी रचनाओं में सत्ता की कुर्सी पर बैठे शासकों के चरित्र और उनकी प्रवृत्तियों को सीधे और स्पष्ट शब्दों में अभिव्यक्त करती हैं—
"सिंहासन की तो पहली शर्त होती है
कि उसपर बैठते ही हर राजा
सबसे पहले, सबके लिए
भला और न्याय हो"
मगर सत्ता में आते ही शासक अपनी वाणी बदल देते हैं। वे चुनाव के समय किए गए वादों के विपरीत कार्य करने लगते हैं। अब वे जनता से संवाद करने के बजाय उसे आदेश देने लगते हैं। वे अपनी प्रशंसा करने के लिए कहते हैं, अपनी इच्छा के अनुसार सहमत होने का दबाव बनाते हैं और उसी के अनुरूप नियम बनाने लगते हैं। जो लोग उनकी बात नहीं मानते, उन्हें दमन का सामना करना पड़ता है और कई बार उन्हें मृत्यु के घाट भी उतार दिया जाता है। ऐसे—
"सत्ता में बैठा आदमी भी/मुझ पर राजनीति करता है
और मैं असहाय/कुछ समझ नहीं पाता हूँ
मैं कुछ समझ पाऊँ/कि कौन, किस तरह, कब
मेरा शिकार करता है/इससे पहले ही
मैं मार दिया जाता हूँ।"
एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक होने के नाते कवयित्री अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होतीं। वे कविता के माध्यम से शासक से प्रश्न करती हैं, उसकी गलत नीतियों का विरोध करती हैं तथा अन्याय के विरुद्ध दृढ़ता से खड़ी होती हैं। इस प्रकार वे अपनी सजगता, सामाजिक प्रतिबद्धता और जनपक्षधर चेतना का परिचय देती हैं। इस प्रकार—
"मैं ऐसे हर उस राजा के खिलाफ बोलूँगी
जो मेरे नाम पर
इंसानों की हत्या कर सकता है
ऐसा राजा भला इंसान कैसे हो सकता है।"
इस प्रकार एक ही प्रकार का विचार और व्यवहार समाज में प्रमुखता से दिखाई देने लगता है। यही विचारधारा संगठित होकर खुलेआम सड़कों पर घूमने लगती है और अपने विरोधियों के विरुद्ध साज़िश रचते हुए राष्ट्रधर्म के नाम पर भीड़ द्वारा हिंसा और हत्या जैसी घटनाओं को अंजाम देती है। धीरे-धीरे यह विचारधारा प्रेम और मानवीय संबंधों पर भी इस कदर हावी हो जाती है कि मनुष्य दूसरे मनुष्य को भी पहचानने की संवेदना खोने लगता है। इस स्थिति को कवयित्री इस प्रकार व्यक्त करती हैं—
"मेरी सोच के भीतर
अचानक बज उठा है राष्ट्रगान
और मैं खड़ा हूँ
राष्ट्रद्रोही कहलाने के डर से
सावधान मुद्रा में"

निष्कर्ष:
जसिंता केरकेट्टा की कविताओं में आदिवासी दर्शन का सार्थक चित्रण मिलता है। साथ ही, मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए मानवता-विरोधी शक्तियों के विरुद्ध सशक्त प्रतिरोध का स्वर भी दिखाई देता है। आज वैश्वीकरण को बाज़ारीकरण, बहुराष्ट्रीयकरण, भूमंडलीकरण, व्यापारीकरण आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है। इसके परिणाम आज सभी के सामने स्पष्ट हैं। इसके प्रभाव से पर्वत, नदियाँ और संपूर्ण प्राकृतिक परिवेश संकट में हैं, जिसका सजीव चित्रण इस शोध-पत्र में प्रस्तुत किया गया है।

 संदर्भ-सूची (References) 

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लेखक: रुपक कुमार
पदनाम: शोधार्थी, हिन्दी विभाग, ल. ना. मि. विश्वविद्यालय दरभंगा
मो: 9709771436 | ई-मेल: kumarrupak993@gmail.com


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