अनुशासन का पाठ (लघुकथा) - तेज नारायण राय

आज कक्षा में सभी बच्चे बहुत खुश नज़र आ रहे थे। खुशी इस बात की थी कि अभी-अभी स्कूल में निःशुल्क कॉपियाँ बँटने वाली थीं। बच्चे आपस में इसी बात को लेकर चर्चा कर ही रहे थे कि अचानक कक्षा में गुरुजी का प्रवेश होता है। गुरुजी के आते ही सभी बच्चे एक साथ खड़े होकर सामूहिक स्वर में उन्हें प्रणाम करते हैं। गुरुजी बच्चों को बैठने का संकेत करते हैं और बच्चे बैठ जाते हैं।
गुरुजी ने क्लास मॉनिटर को आदेश दिया, "जाओ, नीचे पुस्तकालय से कॉपियों का बंडल उठाकर ले आओ। अभी सबको कॉपियाँ बाँटनी हैं।" गुरुजी की आज्ञानुसार मॉनीटर नीचे जाकर पुस्तकालय से कॉपियों का बंडल ले आता है।
कॉपियाँ बाँटने से पहले गुरुजी ने कहा, "जो बच्चे स्कूल ड्रेस पहनकर नहीं आए हैं, उन्हें कॉपी नहीं दी जाएगी। सिर्फ उन्हीं बच्चों को कॉपियाँ मिलेंगी जो स्कूल ड्रेस में आए हैं।"
गुरुजी के इतना कहते ही सभी बच्चे एक-दूसरे को देखने लगे।
गुरुजी ने कॉपियाँ बाँटना शुरू किया। जो बच्चे स्कूल ड्रेस में थे, वे आते गए और एक-एक करके कॉपियाँ लेकर खुशी-खुशी अपने स्थान पर बैठते गए।
कक्षा में एकमात्र लड़की रीना बच गई, जो कॉपी लेने के लिए अपने स्थान से नहीं उठी और उदास बैठी रही। कारण यह था कि वह स्कूल ड्रेस पहनकर नहीं आई थी।
अन्य दिनों की तरह आज भी वह सलवार-सूट पहनकर आई थी। आज उसने लाल रंग का सूट पहन रखा था, जो स्कूल ड्रेस के सामने कुछ ज़्यादा ही चटकदार लग रहा था। उसके इस पहनावे के सामने स्कूल ड्रेस फीका लग रहा था, जो स्कूल की गरिमा और अनुशासन के प्रतिकूल था।
गुरुजी हमेशा बच्चों को स्कूल ड्रेस में आने की हिदायत देते रहते थे, लेकिन रीना इसे लेकर गंभीर नहीं थी। वह हमेशा रंग-बिरंगी पोशाक पहनकर आ जाती थी और गुरुजी के पूछने पर अक्सर कोई न कोई बहाना बना देती थी।
कॉपी न मिलने के कारण रीना के चेहरे पर उदासी की लकीरें उभर आईं। उसकी आँखों में आँसुओं का समंदर हिलोरें मार रहा था। गुरुजी को इस बात का अहसास हो रहा था, लेकिन कुछ पल के लिए वे रीना को नज़रअंदाज़ करते हुए उस पर नज़र रखे हुए थे। वे अंदर ही अंदर उसके चेहरे के भावों को पढ़ रहे थे।
जब रीना ज़्यादा भावुक होने लगी, तब गुरुजी ने बड़े प्यार से उसे अपने पास बुलाया और पूछा, "रीना बेटी, बताओ अभी तुम्हें कैसा लग रहा है?"
"बहुत ख़राब लग रहा है गुरुजी! अंदर से बहुत ख़राब लग रहा है," रीना ने उदास होकर कहा।
"लग रहा है न ख़राब?" गुरुजी ने पूछा।
"जी गुरुजी!"
"पर बेटी, क्यों ख़राब लग रहा है? क्या मैं जान सकता हूँ?"
रीना बोली, "गुरुजी, सबको कॉपी मिली, पर मुझे नहीं मिली। गलती मेरी ही है कि मैं स्कूल ड्रेस पहनकर विद्यालय नहीं आती हूँ।"
गुरुजी ने समझाया, "फिर तुम ही बताओ रीना, जब मेरे बार-बार कहने पर भी तुम रोज़ स्कूल ड्रेस पहनकर नहीं आती हो, तो मुझे कैसा लगता होगा?"
रीना ने हाथ जोड़कर माफी माँगते हुए कहा, "मुझे माफ कर दीजिए गुरुजी। मैं समझ गई, अब बिल्कुल समझ गई। अब ऐसा नहीं होगा। मैं अब रोज़ स्कूल ड्रेस पहनकर ही स्कूल आऊँगी।"
गुरुजी ने प्यार से उसके माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, "तुम बहुत अच्छी और समझदार लड़की हो रीना। एक कहावत है— 'देर आए दुरुस्त आए, जब जागो तब सबेरा।' जाओ, जाकर कॉपियाँ ले लो और मन लगाकर पढ़ाई करो।"
गुरुजी का स्नेह पाकर रीना खुश हो गई और कॉपियाँ लेने के लिए आगे बढ़ी। कॉपियों को स्पर्श करते ही उसके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। उसने कॉपियाँ उठाईं और मन ही मन यह संकल्प लिया कि अब से वह रोज़ स्कूल ड्रेस पहनकर ही विद्यालय आएगी।
उसने पलटकर गुरुजी की तरफ देखा। गुरुजी ने आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया और मंद-मंद मुस्कुराने लगे।

- तेज नारायण राय
मूल निवासी: ग्राम-कुल्हड़िया, पोस्ट-भैरवपुर, थाना-जामा, जिला-दुमका (झारखंड)

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