सम्मान की भूख(लघुकथा) - सिद्धेश्वर

"रश्मि, आज बहुत अच्छा मौका है। प्रगति मैदान में पुस्तक मेला लगा हुआ है। बहुत दिनों से हमारी आपसे मुलाकात नहीं हुई है। क्यों न मेले में हम दोनों मिलें? कुछ पुस्तकों की खरीदारी भी हो जाएगी और चाय-पानी के बहाने हम मेला भी घूम लेंगे।"
"हाँ… हाँ! क्यों नहीं, सुरेश जी! आपसे मुलाकात करना तो मेरा सौभाग्य है! आप जैसे श्रेष्ठ साहित्यकार से मिलकर फुर्सत का कुछ समय बिताने की इच्छा किसे नहीं होगी? फिर आप तो हमेशा ऑनलाइन कवि-सम्मेलन में मुझे पूरा स्थान देते हैं। आपसे मेरी गहरी साहित्यिक मित्रता है… तो हम मिलते हैं शाम को पुस्तक मेले में!"
फोन पर यह वार्ता होने के बाद सुरेश मेले जाने की तैयारी करने लगा। मेले परिसर में ही उसका एक साहित्यिक मित्र विकास, एक ऑफलाइन कवि-सम्मेलन का आयोजन कर रहा था। लेकिन सुरेश ने वहाँ समय व्यतीत करने की अपेक्षा आज अपनी साहित्यिक मित्र रश्मि से मिलना ज़्यादा बेहतर समझा। 'कवि-सम्मेलन तो होते ही रहते हैं, आज पुस्तक मेला ही देखा जाएगा, फुर्सत का समय मित्र रश्मि के साथ बिताया जाएगा...!'
वह पुस्तक मेले में रश्मि का इंतज़ार कर रहा था, मगर वह कहीं नज़र नहीं आई। जब भी फोन लगाता, या तो व्यस्त (एंगेज) मिलता या फिर यह संदेश (मैसेज) आता कि वह तुरंत पहुँच रही है।
पुस्तक मेले में कवि-सम्मेलन आरंभ हो चुका था। वह कवि-सम्मेलन की दर्शक-दीर्घा में बैठकर ही अपनी मित्र रश्मि की प्रतीक्षा करने लगा।
वह निराश होकर पुस्तक मेले में चहलकदमी करते हुए इंतज़ार कर ही रहा था कि तभी रश्मि का फोन आया—
"मैं पुस्तक मेले में आ तो गई हूँ….. लेकिन कवि-सम्मेलन के मंच पर हूँ। मुझे जब पता चला कि मेरे एक और मित्र विकास यहाँ ऑफलाइन कवि-सम्मेलन कर रहे हैं, तो मैं खुद को रोक नहीं पाई। आप भी यहीं आ जाइए न!"
फोन आते ही सुरेश का चेहरा उतर गया। जिस कवि-सम्मेलन को छोड़कर वह रश्मि का इंतज़ार कर रहा था, उसने अपना कार्यक्रम अचानक क्यों बदल दिया?
सुरेश सोच रहा था कि कवि-सम्मेलन से अधिक महत्त्व उसने अपनी मित्र रश्मि को दिया और उसने…?
निराशाग्रस्त स्वर में वह एक बार फिर फोन लगाकर बुझे मन से बोला—
"बिल्कुल झूठी हैं आप! आपने तो वादा किया था कि पुस्तक मेले में मेरे संग घूमेंगी। मैं अपना सारा काम छोड़कर आपके साथ कुछ समय बिताने के लिए यहाँ आया हूँ। और फिर मैं तो आपको हमेशा अपने ऑनलाइन कवि-सम्मेलन में आमंत्रित करता ही हूँ, मगर आप तो…!"
फोन पर उधर से रश्मि का जो उत्तर आया, उसे सुनकर वह भीतर से टूट-सा गया। रश्मि यह कहते हुए फोन काट देती है—
"अब विकास जी ने मुझे मंच पर बुला ही लिया तो मैं क्या करती? सुरेश जी… बहुत अंतर होता है ऑनलाइन और ऑफलाइन गोष्ठी में…! ऐसे मौके बार-बार मिलते हैं क्या?"

- सिद्धेश्वर 
पटना, बिहार 

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