शहीद की पत्नी (कविता)- शालिनी सिंह

मैं शहीद की पत्नी हूँ,
मैंने भी किए थे व्रत पावन।
पूजा था शिव को भर सावन,
मैंने भी रखा था तीज पर्व,
निर्जल रहकर था हुआ गर्व।
कहते थे सभी दे-दे के जोर,
तुम ध्यान सदा देना इस ओर—
सुहाग रहेगा तेरा अटल,
जो प्रेम करे पति से निश्छल।
हाँ, किया था मैंने प्रेम बहुत,
माने थे नियम और धर्म बहुत।
पर भाग्य लिखा कुछ और ही था,
जो हुआ, वही सौभाग्य ही था।
उसने भारत की धरती को,
खुद से भी ज़्यादा जाना था।
था प्रेम वो करता भारत से,
माँ भारती का दीवाना था।
सिंदूर तो मेरी माँग भरा,
पर प्राण देश में बसते थे।
पल-पल देश-रक्षा खातिर,
सौगंध वो खाया करते थे।
प्रेम किया उसने मुझसे भी,
मुझको भी गले लगाता था।
पर लाल चुनर न भाती उसे,
तिरंगे पे जान लुटाता था।
जीवन के आखिरी मिनटों में,
उसने था किया ऐसे इज़हार।
रक्त से अपने भरी माँग,
किया था धरा का अद्भुत शृंगार।
उस दिन तो भारत माता भी,
अश्रु बहाकर रोई थी।
पुत्र-वियोग से हो पीड़ित,
चिरकाल विकल हो खोई थी।
ढांढ़स मुझको देते थे सब,
सांत्वना देकर जाते थे,
पर उस वसुधा से पूछे कोई,
जिसके सुत शीश कटाते थे।
कहते थे मुझसे— "तू साहसी,
जो मुझसे ब्याह कर आई है।
मेरा खुद का ठिकाना नहीं यहाँ,
मेरा घर तू बसाने आई है।
मेरी माता भारतभूमि है,
मेरा पहला प्रेम भी वही प्रिये!
उन पर ही प्राण लुटाऊँगा,
जीवन भी उन्हीं के नाम प्रिये!
न जाने बुलावा कब आ जाए,
तुम रहना सदा निश्चिंत प्रिये।
निष्प्राण होकर जब लौटूँ मैं,
करना न रुदन तुम प्राणप्रिये।"
पहली-अंतिम इच्छा थी यही,
वे प्राण गँवाएँ भारत पे।
जीवन भर की अभिलाषा यही,
सदा शीश नवाएँ भारत पे।
मुझसे माँगा उपहार यही,
इतना करना मेरी प्राण प्रिय —
"सिंदूर से अपने लिख देना,
मेरी कब्र पे भारत माँ की जय!"
ऐसे पुरुषार्थी की पत्नी हुई,
ये अहोभाग्य कुल के मेरे थे।
लगता है पूर्वजन्म में मैंने,
पुण्य किए बहुतेरे थे।
स्वाभिमान से कहती हूँ,
विधवा नहीं, वीरांगना हूँ!
सावित्री न बन पाई तो क्या,
उस अमर जवान की भार्या हूँ!

शालिनी सिंह 
पटना, बिहार

6 टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुंदर रचना शालिनी जी

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  2. "मैं शहीद की पत्नी हूँ" शीर्षक कविता से सुश्री शालिनी सिंह ने सेना का देश के प्रति समर्पण भाव के साथ साथ उनकी उन वीरांगना का चारित्रिक चित्रण किया है जो देश हित में अपने पति का किसी भी समय शहादत होने की बात जानते हुए भी वो देश के लिए उनके मर मिटने की भाव में बाधक नहीं बना। ऐसे वीरांगना की त्याग और बलिदान के लिए हम भारतीयों को सदैव उनके लिए कृतज्ञ होना चाहिए। अदभुत अभिव्यक्ति के लिए शालिनी सिंह को धन्यवाद प्रेषित करते हुए भविष्य में ऐसी बहुत ओजमई एवम भावविह्वल रचना की उम्मीद करता हूँ।

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    1. आपके इन प्रोत्साहन भरे सुंदर शब्दों का दिल से आभार 🙏

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  3. एक सैनिक और उसकी पत्नी के प्रेम की इस सम्वेदनशील रचना के लिए शालिनी जी को बहुत-बहुत बधाई। यह रचना केवल क बिछुड़न की कहानी नहीं है बल्कि,देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाले परिवार के मौन बलिदान की एक मर्मस्पर्शी गौरवगाथा है।

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