अलमा (कहानी) - बैतुल्लाह अंसारी

शाम के सात बजे थे। सूरज डूबने के बाद अंधेरा फैल चुका था। लोग अपने-अपने घरों को लौट रहे थे कि अचानक सायरन बजा... यह ख़तरे की घंटी थी... अलमा अपनी माँ, भाई और बहन के साथ एक कमरे में चली गई... और खिड़की से बाहर की तरफ़ देखने लगी।
बाहर अफ़रा-तफ़री का माहौल था... लोग इधर-उधर भाग रहे थे... ग़ज़ा की बिजली कट चुकी थी... चारों तरफ़ ख़ौफ़ का आलम था... अलमा के पिता अभी तक घर नहीं पहुंचे थे... देखते ही देखते इज़रायली बमबारी शुरू हो गई...
गरज की आवाज़ फ़िज़ा में गूँजती रही... बम गिरते रहे...
मकान तबाह होते रहे...
अलमा अपने घर के एक कोने में दुबक गई कि अचानक एक बम उसके घर पर गिरा और घर ज़मींदोज़ हो गया...
मलबे में सभी लोग दब गए... लेकिन अलमा अभी ज़िंदा थी...
मलबे के बीच बाहर से रोशनी आ रही थी... वह चिल्लाती रही...
"मैं अलमा, नीचे दबी हूँ..."
किसी ने बाहर से आवाज़ सुनी...
"घबराओ नहीं... हम लोग कोशिश कर रहे हैं..." और
दो-तीन घंटे बाद अलमा मलबे से बाहर आ चुकी थी... पर माँ, भाई और बहन सब खो चुकी थी... उसके पिता का कोई अता-पता नहीं था...
अलमा रोती, बिलखती और चिल्लाती रही...
और बोली, "मैं भी मर जाना चाहती हूँ... अब मेरा कोई नहीं बचा..."
टोले के रशीद, बशीर और चंद लोग जान पर खेलकर मलबे से लाशें और ज़िंदा ज़ख़्मी इंसान निकाल रहे थे...
अलमा को किसी तरह रफ़ा कैंप में पहुँचा दिया गया, जहाँ बहुत सारे बच्चे बिना माँ-बाप के थे...
फ़हद इब्न तारिक भी उसी कैंप में ठहरे हुए थे... उनके कुनबे के तमाम लोग इज़रायली बमबारी में मर चुके थे...
अलमा को देखते ही उनकी आँखों में कुछ आँसू आए और सूख गए...
उन्होंने अलमा को अपने पास रख लिया और बोले, "घबराओ नहीं बच्ची, आज से हम तुम्हारे पिता हैं..."
रफ़ा कैंप में अलमा जैसे हज़ारों बच्चे थे... जो यतीम हो चुके थे...
ज़िंदगी फिर से पटरी पर लौटने लगी थी...
शरणार्थियों का ताँता अभी तक लगा हुआ था... खाने-पीने की चीज़ों की काफ़ी कमी थी...
मदद का सामान बड़ी मुश्किल से कैंप तक पहुँच रहा था...
पीने के लिए पानी भी नहीं था...
कभी-कभी मदद के पैकेट जहाज़ों से गिरते... फिर भी इंसान उम्मीद पर ज़िंदा था कि हालात जल्द ही सामान्य हो जाएँगे...
इज़रायली बमबारी से वेस्ट बैंक और ग़ज़ा में लगभग चालीस हज़ार फ़िलिस्तीनी शहीद हो चुके थे...
और लगभग बीस लाख लोग आस-पास के मुल्कों में जाकर पनाह ले चुके थे... नौ महीने से बमबारी जारी थी और कब तक चलेगी इसका कोई अंदाज़ा नहीं...
क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के दबाव के बाद भी इज़रायल मनमानी करता रहा...
हमास और हूती लड़ाकों को वह बुरी तरह कुचल देना चाहता था,
पर ऐसा हो न सका...
सात अक्तूबर 2023 को हमास लड़ाके, जो फ़िलिस्तीन की ज़मीन की आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं, उन्होंने सात हज़ार मिसाइलों से इज़रायल के अलग-अलग शहरों पर हमला कर दिया... जिसमें लगभग दो हज़ार इज़रायली मारे गए... और सैकड़ों लोगों को क़ैद कर लिया ताकि इज़रायली सरकार घुटनों के बल आ जाए... लेकिन इज़रायली सरकार 'अना' (अहंकार) के नशे में चूर हमास और हूती के ख़िलाफ़ जंग शुरू कर दी... फिर क्या था, लोग रोज़ाना मरते रहे... स्कूल-कॉलेज, मस्जिद, गिरजाघर, अस्पताल और मकान तबाह होते रहे...
पश्चिमी देश हों या अरब मुल्क,
ख़ामोशी से तमाशबीन बनकर देखते रहे... मसले का हल दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा था...
फ़िलिस्तीनियों की ज़िद है कि वह अपनी ज़मीन लेकर रहेंगे... उधर इज़रायली भी ज़िद पर हैं कि यह ज़मीन छोड़ेंगे नहीं...
फ़हद इब्न तारिक रिफ़्यूजी कैंप में अपंग लोगों की मदद करते रहे... अलमा का ख़ास ख़्याल रखते...
अलमा दूसरे बच्चों के साथ घुल-मिल गई... मगर अपनों को भूल नहीं पाई थी...
दूसरे बच्चों को रोते देखकर वह भी रोने लगती...
उधर हूती, हमास और हिज़्बुल्लाह ग्रुप ने गुरिल्ला जंग में इज़रायल को नाकों चने चबवाए...
इज़रायल के सैकड़ों मर्कावा टैंक और जहाज़ तबाह-ओ-बर्बाद होते रहे... लगभग पाँच हज़ार इज़रायली बमबारी में मारे जा चुके थे...
फिर भी बड़ी ताक़तों के बल पर इज़रायली फ़ौजें मैदान में डटी हुई थीं... लगभग अस्सी फ़ीसदी ग़ज़ा बर्बाद हो चुका था... उधर रफ़ा रिफ़्यूजी कैंप पर भी बम गिर रहे थे... लोग मर रहे थे... इसका विरोध ख़ुद इज़रायल में भी होने लगा... लेकिन ज़ालिम सरकार ज़ुल्म करती रही...
फ़हद इब्न तारिक ने रिफ़्यूजी कैंप के कुछ नौजवानों को इकट्ठा किया... और उन्होंने हमास ग्रुप की मदद करने की अपील की...
सभी नौजवान तैयार हो गए और हमास ग्रुप में जा मिले... रोज़-रोज़ हवाई बमबारी होती रही... जवान, बच्चे, बूढ़े—सभी का ख़ून बहता रहा... लोग पानी को तरसते रहे... फिर भी ज़िंदगी ख़ाक और ख़ून के बीच चलती रही...
उधर हूतियों का लाल सागर में अमेरिकी, फ्रांसीसी और ब्रिटिश जहाज़ों पर हमला जारी था... समंदर की आगोश में कितने जहाज़ गुम हो गए... इज़रायल और उसके साथ खड़े मुल्कों की पूरे आलम में थू-थू हो रही थी...
अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के दबाव के बाद भी इज़रायल मनमानी करता रहा... जंग चलती रही... आसमान से गोले बरसते रहे...
फ़हद इब्न तारिक ने भी सुरंग के अंदर मोर्चा संभाल लिया और रॉकेट से कितने मर्कावा टैंक तबाह कर दिए... सैकड़ों इज़रायली फ़ौजी मौत के घाट उतर गए... अचानक एक बम सुरंग के पास फट गया, जिसमें फ़हद इब्न तारिक ज़ख़्मी होकर ज़मीन पर गिर पड़े...
ख़ून बहता रहा... होंठ सूखते रहे... फिर भी उनके चेहरे पर मुस्कान की झलकियाँ दिखाई दे रही थीं... उन्हें लग रहा था जैसे उनके साथी जंग जीत जाएँगे... और एक दिन वह मौत का निवाला बन गए...
अलमा अब अकेली पड़ चुकी थी... उसकी आँखें फ़हद इब्न तारिक को ढूँढती रहीं, पर वह नज़रों से ओझल हो चुके थे...
कैंप में बच्चे सहमे-सहमे थे... क्योंकि रफ़ा कैंप पर बमबारी लगातार जारी थी...
इज़रायल सरकार ने रफ़ा कैंप ख़ाली कर देने का हुक्म जारी कर दिया... कुछ लोग कैंप छोड़ने लगे थे...
अलमा अब सोच में थी कि वह कहाँ जाए... वह कैंप के बच्चों के साथ घुल-मिल चुकी थी... लेकिन वहाँ दहशत का माहौल था... फिर भी वह हिम्मत के साथ बोली...
"मरूँ या जिऊँ, यहीं रहूँगी..."
और अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेलने चली गई।

- बैतुल्लाह अंसारी
   सारण, बिहार

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