योग शक्ति (कविता) - त्रिपुरारी कुमार पाण्डेय

न जाने कब मिले, हो गई दोस्ती-यारी,
क्रिया योग की जमकर कर ली तैयारी।

मिला वही जो कहा आपने, पाया सबने,
शक्ति-जागृत-मंत्र बताया सबको रब ने।

शक्ति-जागृत-मंत्र वही जो कृष्ण कन्हैया,
करते बैठ कालिया के फन ता-ता-थैया!

वही जागृत मंत्र कि जिसने रावण मारा,
दुराचारी को पलभर में जिसने संहारा।

यह वह मंत्र जो दे जाता है जीवन-मुक्ति,
यह आराध्य से मिलवाता है देकर भक्ति।

इसने कई दफ़ा देखा है दुखों से निपटना,
गुरु की कृपा हुई, न समझो तन से लिपटना।

कुंडलिनी-जागृति करता यह योग बड़ा है,
हर संकट-चौराहे पर तन आज खड़ा है।

आओ, पहले पाओ, जाओ ख़ुश हो करके,
अरे मूढ़! क्यों अजगर-सा है मर-मर करके?

यदि जागृत नहीं हुई, जीवन धिक्-धिक् है,
फिर कोटि-कोटि जैसा तू बना पथिक है।

सावधान! जीवन संचालित करता जो है,
तेरे पथ को देता शक्ति मात्र प्रभु है।

— त्रिपुरारी कुमार पाण्डेय 

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