एकल गीत (छंदमुक्त) - प्रसाद रत्नेश्वर
सूख रहीं शाखाएँ असमय, अजर-अमर पेड़ की केवल सौ साल। पसंद थी हमें घने पेड़ की छाया, गाते…
सूख रहीं शाखाएँ असमय, अजर-अमर पेड़ की केवल सौ साल। पसंद थी हमें घने पेड़ की छाया, गाते…
बरखा बच्ची थी तब भी प्यारी थी, मिट्टी-धूल की सौंधी महक से लिपटी। काली घटाओं के केश म…
बोलने का मन हो, कुछ बातें एकांत के लिए भी बचाकर रखो। सुनसान में कह सकते हो, गा सकते …
आजकल... आँखों पर पट्टियाँ बाँधकर दौड़ में शामिल हैं लोग, दिल पर अपने हाथ रखकर भी अब …
कृषक के खेत से करके शस्य-हरण, कर लिया मूषक ने धनिक-वेश धारण। फिर एक कृष्ण-विषधर झपटा…
स्त्री-मन धरती जैसा होता है। उसे मिलती रहे सम्मान की धूप, स्नेह का जल, और विश्वास की…
प्रेम में देना मुझे, कनेर के फूल प्रिय! सज कनुप्रिया के जूड़े ज्यों इतराऊँ, पीत-पट श…
चले अपने क़दमों से गिरते-उठते कराया जन से लोक कला, संस्कृति, साहित्य का साक्षात्कार।…
लगभग बीस फीट ज़मीन से ऊँचाई, बीस फीट खंभों की लंबाई, बीच में बंधी रस्सी, इतनी ही रस्…
सोने के कटोरे में लेकर दूध-भात, कभी आया नहीं वह चाँद... हमारे लोकगीतों में भी, हुआ ह…
कलाई पर बँधा धागा सिर्फ़ धागा नहीं होता, बँधा होता है इसमें बचपन का स्नेह, आँगन की खि…
दशकों पहले बहन, भाई की कलाई पर राखी बाँधा करती थी, वह धागा केवल शोभा नहीं होता था। उ…
मैं नहीं हूँ तुम्हारी तरह इतना गिरा हुआ कि सच छोड़ दूँ, झूठ की ख़ातिर। भीड़ देखकर रा…
जीवन को जिसने धिक्कारा, समर को हँसकर स्वीकारा। धर्मोदात्त वह वीर महान, वीरता जिसकी थ…
जाने क्यों, सभी डरा रहे हैं मुझे, जिया में धुकधुकी सी मची है। बत्ती भी गुल है, बोतल …
गली के मोड़ पर अब भी धुआँ उठ रहा है— कल तक जहाँ एक दुकान थी, आज वहाँ सिर्फ़ राख है औ…
फिर सुबह हुई, दिनकर करता रहा इंतज़ार मेरे जगने का। मैं सोया रहा, वह बढ़ चला आलोक-पथ …
कथित “सभ्य” कहे जाने वाले, समाज के कुछ चेहरे। धीमे पग धर, आहट छिपाए, चढ़ते हैं अंधी …
शहर के चौराहे पर खुल गई अँधेरे की दुकान बेचा जा रहा है खुलेआम तोल तोल कर और खड़ा है …
मुहब्बत- जैसे अलसुबह मंदिर से आती हुई घंटियों की झंकार, आरतियों की मधुर-मधुर स्वर-ल…