जीवन को जिसने धिक्कारा,
समर को हँसकर स्वीकारा।
धर्मोदात्त वह वीर महान,
वीरता जिसकी थी पहचान।
नैतिकता का वह परिचायक,
त्याग, साहस का था विधायक।
जटायु ने जग को सिखलाया—
क्या होती है सच्ची चिरायु,
किसे कहते हैं दीर्घायु।
कौन है जटायु?
जो मृत्यु को भी पुरस्कार समझ,
ऊँचा मस्तक कर स्वीकारे।
अन्याय के सम्मुख अडिग खड़ा हो,
धर्म हेतु जीवन भी वारे।
उसने रावण को ललकारा,
अधर्म के सम्मुख हुंकारा।
जिसके शब्दकोश में कभी
पलायन जैसा शब्द न था,
ऐसे योद्धा को भला
कौन पराजित कर सकता था?
बूढ़े जटायु के पास न बल था,
न कोई छल, न कोई खल था।
न कोई युक्ति, न उचित हल था,
केवल अटूट मनोबल था।
मन निर्मल था,
विवेक प्रबल था।
वृद्ध जटायु
मारा तो गया,
किन्तु रावण
जीत न सका।
अपराध और अनर्थ
अंततः हार ही जाते हैं।
अहंकार के ऊँचे शिखर भी
एक दिन धूल हो जाते हैं।
रावण के अमर दंभ पर
यह नैतिकता का प्रहार था,
उसके अभिमान के सीने में
धर्म का तीक्ष्ण कटार था।
गिद्धराज, गृध्रकूट का राजा,
साहस जिसका था सरताजा।
वह रणभूमि में गिरकर भी
इतिहास अमर कर गया।
जटायु मरकर भी जीत गया,
मृत्यु भी जिसके सम्मुख हार गई।
धर्म की रक्षा में अर्पित वह देह,
युगों-युगों तक अमर हो गई।
— दोलन राय
औरंगाबाद, महाराष्ट्र