तिराहा (लघुकथा) -भगवती प्रसाद द्विवेदी

गाँव के तिराहे पर तीनों अचानक टकरा गए—तीनों तीन राह से। दाढ़ी, बहुरिया और दीपू। पति, पत्नी और इकलौता बेटा। तीनों तीन जगह। वैसे तो तीनों गाँव के लखन बाबा के संयुक्त परिवार का हिस्सा थे, पर तीनों अपने-अपने नसीब पर घड़ों आँसू बहा रहे थे।
दरअसल दाढ़ी अपनी लफ़ंगई के लिए मशहूर था। चेहरे पर लंबी दाढ़ी के कारण मदन के बजाय वह 'दाढ़ी' के नाम से ही जाना जाता था। कम उम्र में ही दादा ने उसकी शादी कर दी, ताकि उसे अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो सके। मगर विवाह के बाद भी उस पर कोई असर नहीं हुआ। उल्टे, वह एक बच्चे दीपू का बाप बन गया। फिर तो दादा ने रोज़ी-रोटी कमाने के लिए उसे घर से बेघर कर दिया।
बहुरिया को एक खपड़ैल कमरा ज़रूर मिल गया था, लेकिन खाने-पीने को कुछ नहीं दिया गया। दीपू से घर के कुछ काम करवाए जाते थे और खाने-पीने को कुछ रूखी-सूखी चीज़ें मिल जाती थीं। दाढ़ी तो घर से और गाँव से ऐसे ग़ायब हुआ, जैसे गधे के सिर से सींग।
बहुरिया बेचारी कहाँ जाती, क्या करती! मगर मरता क्या न करता! पापी पेट की भूख ने उसे आसपास के घरों में चूल्हा-चौका, झाड़ू-बुहारू, कुटनी-पिसनी के लिए विवश कर दिया। अपना जाँगर खटाकर ही तो जी सकती थी वह! फलतः वही उसकी नियति और पहचान बन गई। किसी के घर धान कूटकर चूड़ा-चावल बनाना हो, सत्तू या आटा चक्की से पीसना हो, तिलवा पारना हो या काज-प्रयोजन में खटना हो, बहुरिया एक पाँव पर हाज़िर रहती थी। अपना हाथ जगन्नाथ!
उधर दीपू भी गाय-बैल को सानी-पानी देने, गोबर बटोरने, गोइँठा थापने जैसे कामों में लगा दिया गया था। वह थका-हारा कहीं भी सो जाता था। बाल्यकाल में ही वह सयाना हो चुका था। बचपन तो जैसे उसके जीवन में आया ही न हो। उसके हमउम्र बच्चे उसकी खिल्ली उड़ाते, बात-बेबात चिढ़ाते, किन्तु ख़ून के घूँट पीने का वह आदी हो गया था। बालक, किशोर, युवा... वह फटाफट सीढ़ियाँ फलाँगता जा रहा था...
...और तीस साल के बाद युवा दीपू ने बाप 'दाढ़ी' को गाँव के तिराहे पर देखा—कराहते और खाँसते हुए। माँ बहुरिया भी वहीं खड़ी थी। तीनों आमने-सामने, पर तीनों हतप्रभ! तीनों निःशब्द!
सहसा दीपू की मुट्ठियाँ भिंच गईं। उसने पिच्-से थूका और आगे बढ़ गया। बहुरिया के सजल नयन लाल हो गए और वह काज वाले घर की तरफ़ बढ़ गई। दाढ़ी अब भी अपनी बेतरतीब दाढ़ी को खुजलाते हुए किंकर्तव्यविमूढ़-सा ख़ामोश खड़ा था।


-भगवती प्रसाद द्विवेदी 
जन्म: बिहार
हिंदी और भोजपुरी के मूर्धन्य कथाकार, कवि, लघुकथाकार एवं बाल साहित्यकार हैं। आपकी हिंदी-भोजपुरी में 40 से अधिक पुस्तकें तथा बाल साहित्य की शताधिक कृतियाँ प्रकाशित हैं। 'अस्तित्वबोध', 'भविष्य का वर्तमान' और 'सदी का सच' आपकी चर्चित पुस्तकें हैं। आपको 'बालसाहित्य भारती सम्मान', 'निराला पुरस्कार', 'भिखारी ठाकुर सम्मान' सहित कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। आप बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साहित्य मंत्री एवं अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के कार्यकारी अध्यक्ष हैं।

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