अटल: आदमी के रूप में संत थे (कविता) - रविन्द्र कुमार शर्मा

रात गुमसुम है, रात ख़ामोश है,
ख़त्म हर किसी का जोश है।
हर तरफ़ छाई उदासी है,
चेहरे मुरझाए हुए हैं सबके,
सबके लबों पर ख़ामोशी है।

हार न मानने वाला हार गया काल से,
अटल-रूपी पत्ता अब टूट गया डाल से।
अटल तो अटल था करने को,
कुछ भी कर सकता था।
सरकार बनाने के लिए,
जोड़-तोड़ कर सकता था।

न नोटों का लालच था,
न सत्ता का नशा था।
समाज की चिंता थी,
बस यही दिल में बसा था।
ख़ुद्दारी ने टोक दिया,
ग़लत करने से रोक दिया।
सरकार को कर दिया कुर्बान,
ऐसा था वह अटल महान!

पोखरन में परमाणु बम का,
विस्फोट बड़ा किया।
भारत को परमाणु-शक्ति
देशों की श्रेणी में खड़ा किया।
अमेरिका और पाकिस्तान,
गुस्से में हो रहे थे लाल।
क्योंकि उनका डर के मारे था बुरा हाल!

यूएनओ में जब बोलने की,
अटल की बारी आई।
हिंदी में भाषण देकर हिंदी को,
अलग पहचान दिलाई।

अटल की नेकियों का,
हर कोई कायल है।
उनके इस तरह चले जाने से,
सबके दिल घायल हैं।

वह अटल था महान, जिसको
विपक्ष भी करता था सलाम।
जब बोलता था तो सुनते थे सभी,
गुस्सा चेहरे पर न देखा कभी।

आदमी के रूप में थे वह संत,
सहनशीलता थी जिसमें अनंत।
ऐसा था वह अटल महान,
जिसको मेरा शत-शत प्रणाम!


— रविन्द्र कुमार शर्मा
(घुमारवीं, ज़िला बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश)

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