मोहब्बत के तवाज़ुन का कोई आला नहीं होता (ग़ज़ल) - नजमुल्लाह 'नज़्म'


मोहब्बत के तवाज़ुन का कोई आला नहीं होता,
जो जाँ दे इश्क़ में उससे कोई बाला नहीं होता।

किसी जालिम ने चुनवा कर दीवारों में रक़ीबों को,
शहंशाह बन भी जाए तो वो 'वाला' नहीं होता।

अगर मुंसिफ़ सही हो तो अदल का थाम लो दामन,
क्योंकि मासूमों की ख़ताओं का हलाला नहीं होता।

मोहब्बत के दीवानों को कोई रोक नहीं सकता,
लगा दे इश्क़ पर ताला, ऐसा ताला नहीं होता।

'नज़्म' हक़-परस्ती का तुम दामन नहीं छोड़ो,
बुराई करने वाले का कभी भला नहीं होता।

-नजमुल्लाह 'नज़्म'
सारण , बिहार 


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