स्त्री होना केवल एक जैविक घटना नहीं है; वह एक गहरी दार्शनिक अवस्था है।
एक ऐसी अवस्था, जहाँ मनुष्य को जन्म से ही स्वयं के अस्तित्व को सिद्ध करना पड़ता है।
पुरुष अक्सर संसार में अपने होने के साथ प्रवेश करता है, पर स्त्री को अपने “होने” के अधिकार के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ता है।
वह किसी भी धर्म, जाति, वर्ग या संस्कृति की हो — उसके जीवन का मूल संघर्ष लगभग समान रहता है।
उसके शरीर पर समाज अधिकार चाहता है, उसकी चेतना पर परंपरा, और उसकी इच्छाओं पर नैतिकता।
वह जन्म लेते ही केवल एक मनुष्य नहीं रह जाती; वह “सम्मान”, “मर्यादा”, “परिवार”, “संस्कार” और “प्रतिष्ठा” का प्रतीक बना दी जाती है।
यहीं से उसकी स्वतंत्र आत्मा और समाज के बीच एक अदृश्य युद्ध आरंभ हो जाता है।
दार्शनिक रूप से देखें तो हर मनुष्य की सबसे गहरी आकांक्षा होती है — “मुझे मेरे वास्तविक स्वरूप में स्वीकार किया जाए।”
किन्तु स्त्री के साथ विडंबना यह है कि समाज उसे उसके वास्तविक स्वरूप में देखने से भय खाता है।
क्योंकि मौलिक स्त्री केवल प्रेम नहीं करती, वह विचार भी करती है।
वह केवल सहन नहीं करती, वह प्रश्न भी करती है।
और प्रश्न हर व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा भय होते हैं।
मनुष्य की सभ्यता ने स्त्री को दो अतियों में बाँट दिया — देवी या दासी।
बीच का जो साधारण, जटिल, संवेदनशील मनुष्य था, उसे देखने का धैर्य समाज में बहुत कम रहा।
यदि वह अत्यधिक सहनशील है तो पूजनीय है, यदि वह अपनी इच्छा प्रकट करे तो संदिग्ध।
यह विरोधाभास केवल सामाजिक नहीं, गहरा मनोवैज्ञानिक भी है।
मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य उसी चेतना को नियंत्रित करना चाहता है जिससे वह भीतर से असुरक्षित महसूस करता है।
स्त्री की स्वतंत्र चेतना सदियों से सत्ता संरचनाओं के लिए असुविधाजनक रही है, क्योंकि वह जीवन को केवल नियमों से नहीं, संवेदनाओं से देखती है।
वह संबंधों को यांत्रिक नहीं होने देती।
वह प्रेम में भी आत्मा खोजती है।
और शायद इसी कारण उसका दुःख भी अधिक गहरा होता है।
स्त्री का सबसे बड़ा अकेलापन यह नहीं कि लोग उसे समझते नहीं; बल्कि यह कि लोग उसे “भूमिकाओं” में समझते हैं।
कोई उसे माँ की तरह देखता है, कोई पत्नी की तरह, कोई देह की तरह, कोई त्याग की प्रतिमा की तरह — पर बहुत कम लोग उसे एक स्वतंत्र चेतना के रूप में देख पाते हैं।
वह जीवन भर संबंध निभाती है, पर स्वयं के भीतर जो असली स्त्री होती है, वह अक्सर अनकही रह जाती है।
अस्तित्ववादी दर्शन कहता है कि मनुष्य मूलतः अकेला है।
पर स्त्री का अकेलापन और भी सूक्ष्म है, क्योंकि उसे अपने वास्तविक व्यक्तित्व को छिपाकर स्वीकार्यता अर्जित करनी पड़ती है।
वह कई बार मुस्कुराती है केवल इसलिए कि उसका दुःख दूसरों को असहज न कर दे।
वह चुप रहती है क्योंकि उसके शब्दों को “अत्यधिक भावुकता” कह दिया जाएगा।
धीरे-धीरे वह स्वयं के भीतर निर्वासित होने लगती है।
समाज स्त्री के त्याग का उत्सव मनाता है, क्योंकि त्याग करने वाली स्त्री व्यवस्था के लिए सुविधाजनक होती है।
पर जो स्त्री स्वयं को बचाए रखना चाहती है, अपनी आत्मा की रक्षा करना चाहती है, उसे अक्सर कठोर, विद्रोही या असामान्य कह दिया जाता है।
यहाँ प्रश्न यह नहीं कि स्त्री को स्वतंत्रता चाहिए; प्रश्न यह है कि क्या समाज वास्तव में किसी स्वतंत्र स्त्री को सहन कर सकता है?
स्त्री का दुःख केवल बाहरी उत्पीड़न नहीं है।
उसका सबसे गहरा दुःख यह है कि उसे धीरे-धीरे स्वयं से दूर कर दिया जाता है।
उसे इतना सिखाया जाता है कि “दूसरों के लिए जीना ही प्रेम है”, कि एक दिन वह अपनी इच्छाओं को अपराध समझने लगती है।
और जब कोई मनुष्य अपनी ही इच्छाओं से भय खाने लगे, तब उसकी आत्मा भीतर से टूटने लगती है।
किन्तु स्त्री केवल करुणा की कथा नहीं है।
वह सृष्टि का सबसे अद्भुत दार्शनिक रहस्य भी है।
वह टूटती है, फिर भी प्रेम करना नहीं छोड़ती।
वह अस्वीकृत होती है, फिर भी संबंधों में अर्थ खोजती है।
वह पीड़ा से गुजरती है, फिर भी जीवन को जन्म देती है।
उसके भीतर विनाश के बाद भी सृजन बचा रहता है — यही उसकी आध्यात्मिक शक्ति है।
शायद इसी कारण स्त्री को समझना केवल समाजशास्त्र का विषय नहीं, आत्मा का विषय है।
उसे नियमों से नहीं, संवेदनशील चेतना से समझा जा सकता है।
और संभवतः किसी सभ्यता का अंतिम नैतिक प्रश्न यही है —
क्या वह स्त्री को उसकी मौलिकता सहित स्वीकार कर सकती है?
या वह उसे जीवन भर किसी आदर्श, किसी भूमिका, किसी भय के भीतर कैद रखेगी?
क्योंकि जिस दिन स्त्री को “कर्तव्य” नहीं, “अस्तित्व” की तरह देखा जाएगा, उसी दिन मनुष्यता पहली बार सचमुच मानवीय होगी।
-दोलन रॉय
संभाजी नगर, महाराष्ट्र