अमीर खुसरो — गंगा-जमुनी तहज़ीब, खड़ी बोली और कौतुक काव्य के अमर पुरोधा

हिंदी साहित्य का आदिकाल जहाँ एक तरफ राजाओं के शौर्य और युद्धों के वर्णन से भरा हुआ था, वहीं उसी दौर में जनभाषा को अपनी कला का माध्यम बनाकर भारतीय लोक-संस्कृति को अमर करने वाले एक विरल युगद्रष्टा हुए—अमीर खुसरो (1253–1325)। खुसरो को हिंदी खड़ी बोली का 'आदि कवि' माना जाता है। वे मात्र एक दरबारी कवि या सूफी संत नहीं थे, बल्कि वे भारतीय संगीत (सितार और तबला के आविष्कारक), कौतुक काव्य (पहेलियाँ, मुकरियाँ) और सांप्रदायिक सौहार्द के अनन्य प्रतीक थे।

आइए, आज 'बोधायन पत्रिका' के माध्यम से हम आदिकाल के इस बहुआयामी महाशिल्पी के शब्द-वैभव और उनकी कालजयी प्रासंगिकता को नमन करते हैं।

खुसरो ने उस दौर में फारसी के राज्याश्रय में रहते हुए भी हिंदवी (हिंदी) को 'सब भाषाओं से श्रेष्ठ' माना। उन्होंने फारसी और हिंदी का ऐसा सुंदर घालमेल किया, जिसने आगे चलकर आधुनिक खड़ी बोली का मार्ग प्रशस्त किया। उनकी यह गज़ल सदियों से संगीत और साहित्य की साझी विरासत है:

पंक्तियाँ:
ज़िहाले-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल, दुराए नैना बनाए बतियां।
कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ, न लेहु काहे लगाए छतियां॥

इस प्रसिद्ध गज़ल में एक पंक्ति फारसी की है और दूसरी विशुद्ध ब्रज/खड़ी बोली हिंदी की। कवि कहते हैं कि—हे प्रिय! मेरी इस दीन दशा से अपनी आँखें फेरकर और बातें बनाकर बेरुख़ी मत बरतो। अब मुझसे वियोग (जुदाई) की तड़प बर्दाश्त नहीं होती, तुम मुझे अपने सीने से क्यों नहीं लगा लेते?

खुसरो का साहित्य केवल गंभीर दर्शन तक सीमित नहीं था; उन्होंने आम लोगों, विशेषकर बच्चों और महिलाओं के मानसिक विनोद के लिए अद्भुत पहेलियाँ और 'मुकरियाँ' (बात कहकर मुकर जाना) रचीं। उनकी रचनाओं में गजब की तार्किकता और कौतुक था।

पहेली:
"एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा।
चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे॥"
(उत्तर: आकाश/आसमान)

मुकरी :
वह आवे तो शादी होय, उस बिन दूजा और न कोय।
मीठे लागें उसके बोल, ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल॥

 खुसरो की इन मुकरियों में लोक-जीवन का अनूठा रस है। एक सखी दूसरी से कहती है कि उसके आने पर ही शादी होती है और उसकी आवाज़ बड़ी मीठी लगती है। दूसरी सखी पूछती है कि क्या वह साजन हैं? तो पहली सखी चतुराई से मुकरते हुए कहती है—नहीं सखी, वह ढोल है।

अमीर खुसरो को अपने 'हिंदुस्तानी' होने पर अगाध गर्व था। उन्होंने अपनी रचनाओं में भारत की जलवायु, यहाँ के फूलों, पशु-पक्षियों और यहाँ के ज्ञान की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। वे स्वयं को 'तूती-ए-हिंद' (भारत का तोता) कहते थे और गर्व से कहते थे कि अगर तुम्हें कुछ पूछना है, तो मुझसे हिंदवी में पूछो।

अमीर खुसरो का जीवन और उनका काव्य आज के दौर में और भी अधिक प्रासंगिक है। उनका साहित्य हमें सिखाता है कि भाषाएँ दिलों को जोड़ने के लिए होती हैं, तोड़ने के लिए नहीं। खड़ी बोली हिंदी के विकास में उनका योगदान अद्वितीय है। इतिहासकार और आलोचक मानते हैं कि लोक-रंजन और लोक-रक्षण का जो सुंदर समन्वय खुसरो के यहाँ दिखता है, वह आदिकाल में अन्यत्र दुर्लभ है।

साभार और संदर्भ सूची :
स्रोत ग्रंथ: खुसरो की हिंदी कविता (नागरी प्रचारिणी सभा, काशी)।
ऐतिहासिक संदर्भ: आचार्य रामचंद्र शुक्ल कृत 'हिंदी साहित्य का इतिहास' (आदिकाल)।

विशेष आभार: यह आलेख 'बोधायन पत्रिका' के मंच से हमारी साझी संस्कृति के अमर पुरोधा अमीर खुसरो के प्रति सादर साभार समर्पित है।

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