रहे खाली हमारे हाथ
मगर दिल में दुआएँ थीं,
अपनों की खुशी में ही
मेरी दुनिया समाई थी।
नहीं मांगी वफा की आज तक
कीमत कोई मैंने,
जगह लूँ दिल में थोड़ी सी
बस इतनी ही सदाएँ थीं।
किया जो भी नहीं था फर्ज
वो मेरी मुहब्बत थी,
सहा जो दर्द अपनों का
सुनो वो मेरी फितरत थी।
मेरा ये दिल किसी बदले
का प्यासा न रहा फिर भी,
कहे बस 'शुक्रिया' कोई
यही इक मेरी हसरत थी।
थकी हूँ मैं भी समझें वो
वफा की राह में चलके,
जली हूँ मैं भी देखें वो
निरंतर मोम सा जलके।
नहीं दौलत नहीं शोहरत
कोई न ताज चाहिए,
मिले संबल दो लफ्जों से
मुझे गिरते-संभलते।
परिचय :
डॉ. कुमारी सोनी
सहायक प्राध्यापिका
(हिन्दी विभाग)
जी. डी. एम. कॉलेज
हरनौत,नालंदा