किस-किस से लड़कर क्या लोगे (नवगीत)— हरिनारायण सिंह 'हरि'

​किस-किस से लड़कर

क्या लोगे

भरत तिवारी!

​भ्रष्टाचार घुसा

नस-नस में,

बढ़ी खुमारी।

​तंत्र नहीं चल पाएगा,

यह लोहू इसका;

प्रजातंत्र का

चारों पाया

खिसका-खिसका।

​जिधर मुड़ोगे

खड़ा मिलेगा

यही खिलाड़ी;

​किस-किस से लड़कर

क्या लोगे

भरत तिवारी!

​घुसा तंत्र में जो भी,

लंपट बन जाता है;

आम जनों के लिए

वही संकट लाता है।

​हम जिस पर

चल रहे, राह वह

तलवार दुधारी;

​किस-किस से लड़कर

क्या लोगे

भरत तिवारी!

​हममें से ही जाकर

निर्दय बन जाता है;

और हमीं को सहज निवाला

वह पाता है।

​फिर लगाम-चाबुक

ले करता है

असवारी;

​किस-किस से लड़कर

क्या लोगे

भरत तिवारी!

साहित्यकार परिचय

हरिनारायण सिंह 'हरि'

लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार व पत्रकार। हिन्दी में तीन प्रबंधकाव्य, 6 गीत-नवगीत संग्रह, 5 कविता संग्रह, एक दोहा संग्रह, एक ग़ज़ल संग्रह, एक लघुकथा संग्रह और समीक्षा की एक पुस्तक प्रकाशित। बज्जिका में एक महाकाव्य और एक कविता संग्रह प्रकाशित। आकाशवाणी और दूरदर्शन से लगातार प्रसारण। 'हिन्दुस्तान' और 'दैनिक जागरण' में दशकों तक सक्रिय पत्रकारिता। राजनीति विज्ञान के व्याख्याता पद से अवकाशप्राप्त।

  • निवास: जौनापुर, मोहीउद्दीननगर

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