अपलम चपलम (हास्य - व्यंग्य कविता) - ममता तिवारी 'मृदुला '
लकीर के जो फ़क़ीर हैं...। खुद को समझें कबीर हैं...। क़िस्मत इनकी गर्दिश में, फ़ाके क…
लकीर के जो फ़क़ीर हैं...। खुद को समझें कबीर हैं...। क़िस्मत इनकी गर्दिश में, फ़ाके क…
रात का तीसरा पहर। कुछ लोग बड़ी बेसब्री से एक विशेष विमान का इंतज़ार कर रहे थे। उनमें…
लोहे का एक विशाल आकृतिकाय, और भीतर बैठा मैं—शांत, निरुद्देश्य, अभय। पहियों की धक-धक …
वो शमा, वो उड़ते परवाने बस्ती से, चले गए सब यार पुराने बस्ती से। सब बहकावे में हैं आक…
बाप की हर एक विरासत को बढ़ाऊँ कैसे, छोड़के घर, शहर को आज मैं जाऊँ कैसे! ख़ाक होते …
रुख़ से ज़ुल्फ़ें हटाओ कि दीदार हो माज़ी की बातों का फिर से इज़हार हो एक नज़र की ही …
सच बोलूँ, शायद झूठा बनकर रह जाऊँ, किंतु सत्य क्या है? शायद यह कह न पाऊँ। सत्य कठ…