खिड़की पर दिनकर (छंदमुक्त) — प्रसाद रत्नेश्वर
फिर सुबह हुई, दिनकर करता रहा इंतज़ार मेरे जगने का। मैं सोया रहा, वह बढ़ चला आलोक-पथ …
फिर सुबह हुई, दिनकर करता रहा इंतज़ार मेरे जगने का। मैं सोया रहा, वह बढ़ चला आलोक-पथ …
बूंद गिरी बरखा की पहली, बिफरी सी है थोड़ी पगली! म्यूजिक सिस्टम पे गज़ल चला, वही मीर,…
आज़ाद वतन की ख़ातिर वीरों ने प्राण गँवाए, हमें याद है उनकी गाथा, हम उनको भूल न पाए। …
हिन्दी की एक प्रतिष्ठित कवयित्री एवं ग़ज़ल की शोधार्थी होने के कारण कई उर्दू के ग़…
कथित “सभ्य” कहे जाने वाले, समाज के कुछ चेहरे। धीमे पग धर, आहट छिपाए, चढ़ते हैं अंधी …
भगवान् बोले: ज्ञान हेतु हे प्रिय अर्जुन! तुम अब अति श्रद्धावान बनो, माया-बंधन से मुक…
‘लबरा हमर उपनाम । लबरइ हमर उपकाम ।’ बिना लागलपट के बोले के हमर आदत के कारण हमरा प्रत…