फिर सुबह हुई,
दिनकर
करता रहा इंतज़ार
मेरे जगने का।
मैं सोया रहा,
वह बढ़ चला
आलोक-पथ पर।
एक बार नहीं,
हज़ारों बार हुआ है
यह वाकया मेरे साथ,
सोया रहा मैं हर बार!
एक दिन यह सोचकर—
चिढ़ाऊँगा मुँह
उसकी सत्ता को,
बना लिया स्वयं को
नेत्रहीन,
संवेदनहीन
कठपुतला!
उभरने लगे थे
पार्श्व से...
‘इनको मारो जूते चार’
जैसे नारे!
क्या अब भी आता है
मेरी खिड़की पर
दिनकर?
पता नहीं!
— प्रसाद रत्नेश्वर
मोतिहारी, बिहार
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छंदमुक्त