बूंद गिरी बरखा की पहली,
बिफरी सी है थोड़ी पगली!
म्यूजिक सिस्टम पे गज़ल चला,
वही मीर, ग़ालिब की असली!
छोड़ रेनकोर्ट और छतरी,
बजता टिप-टिप टिन-टपरी,
छम-छम करती रिमझिम-रिमझिम,
पानी की देख परी उतरी!
भीगने बुलाता है पानी,
थोड़े तो हो जा रूमानी!
लगा रहेगा रेला-मेला,
खुशियों-ग़म की आनी-जानी!
तलो पकौड़ी आलू वाली,
नमक लगी हो जामुन काली,
साथ में हरी मिर्च तल लेना,
गर्म चाय की भी हो प्याली!
— ममता तिवारी 'मृदुला'
छत्तीसगढ़
Tags
कविता