नई शुरुआत (कहानी) - डॉ. कुमारी सोनी (सोनिया अनंत)

दिव्या खिड़की से बाहर तेज़ होती बारिश को टकटकी लगाए देखे जा रही थी। मानो एक तूफ़ान बाहर चल रहा हो और एक उसके अंदर। अचानक उठकर वह अपने कमरे में कुछ ढूँढने लगती है। कुछ देर बाद उसे एक दुपट्टा मिलता है, जिसे वह पंखे से बाँधने की कोशिश करती है, पर छत की ऊँचाई ज़्यादा होने के कारण नाकामयाब हो जाती है। वह फिर से कुछ और ढूँढने लगती है। तभी उसे अपने बटुए में कुछ पुरानी तस्वीरें और कुछ पैसे मिलते हैं। उन तस्वीरों को देखते ही वह अपने अतीत में खो जाती है।
जब वह पहली बार अपने गाँव से स्नातक करके प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के लिए दिल्ली आई थी, उसके दूर के एक चाचाजी ने लक्ष्मीनगर के पास उसे एक कमरा दिलवा दिया था। दुबला-पतला शरीर, साँवला रंग और छोटा क़द—दिव्या दिखने में भले ही उतनी आकर्षक नहीं थी, परंतु स्वभाव से चंचल, विचारों से गंभीर और आँखों में ढेरों सपने लिए एक मेहनती लड़की थी। वह अपने पापा की बहुत दुलारी थी, इसलिए अपना और अपने पापा का सपना पूरा करने दिल्ली जैसे बड़े शहर में आई थी।
यहाँ आते ही उसने कोचिंग जॉइन कर ली। चूंकि उसके पापा एक ग़रीब किसान थे, तो जितना संभव हो पाता, हर महीने कुछ पैसे दिव्या को भेज दिया करते थे। दिव्या अपने पापा पर ज़्यादा बोझ नहीं डालना चाहती थी, इसलिए उसने पढ़ाई के साथ-साथ एक-दो होम ट्यूशन भी पकड़ लिए थे। इससे उसके रहने, खाने और पढ़ाई का ख़र्च आराम से निकल जाता था।
वह जल्द से जल्द परीक्षा पास करके एक अच्छी नौकरी हासिल करना चाहती थी। इसलिए वह पूरा दिन कोचिंग, अपनी पढ़ाई और ट्यूशन में ही व्यस्त रहती थी। उसके दोस्त बहुत कम बन पाए थे, और जो थे भी, वे उसे कुछ खास पसंद नहीं करते थे। क्योंकि वह न तो उन लोगों की तरह स्मार्ट दिखती थी, न ही उसके पास स्मार्ट मोबाइल था और न ही वह नई चीज़ों से अपडेट रहती थी। वह अपने एक ही रूटीन में खुद को व्यस्त रखती थी।
ऐसा करते हुए एक साल बीत गया, पर अब तक उसे किसी भी परीक्षा में सफलता नहीं मिली थी। हर बार वह कुछ नंबरों से रह जाती। उसकी कोचिंग का ही एक लड़का नीतेश, जो पढ़ाई में काफी अच्छा था, दिव्या की मेहनत देखकर उसकी मदद करना चाहता था। परंतु दिव्या, कहीं अपने उद्देश्य से भटक न जाए, इस डर से उससे दूरी बनाकर रखती थी। बाकी सहपाठियों के साथ भी उसका ऐसा ही व्यवहार था, इसलिए किसी ने उससे ज़्यादा मतलब नहीं रखा।
शुरुआत में तो सब ठीक चल रहा था। पूरे जोश के साथ वह अपने काम में लगी रहती थी। पर एक साल बीत जाने पर भी जब सफलता नहीं मिली, तो धीरे-धीरे वह अपने ही बनाए रूटीन से ऊबने लगी। उसकी सोच में नकारात्मकता घर करने लगी और वह बुझी-बुझी सी रहने लगी। अब उसके पास कोई ऐसा दोस्त भी नहीं था जिससे वह अपना दर्द बाँट सके। उसका वह साथी नीतेश, जिसे वह मन ही मन पसंद करने लगी थी, वह भी अब नीता नाम की लड़की के साथ व्यस्त रहने लगा था।
दिव्या को लगने लगा कि उसे कोई पसंद नहीं करता, कोई उसके साथ समय नहीं बिताना चाहता। इस अकेलेपन से हताश होकर एक दिन उसने फ़ैसला किया कि वह अपनी जीवन-लीला ही समाप्त कर लेगी।
परंतु, उन तस्वीरों में खुद को अपने माता-पिता और छोटे भाई के साथ देखकर वह सोच में पड़ गई—यदि वह इस दुनिया से चली गई, तो उनका क्या होगा? ख़ासकर उसके पिता, जो उस पर इतना विश्वास करते हैं और आशान्वित हैं कि उनकी बिटिया एक दिन कुछ बड़ा करके दिखाएगी। उनके सपनों का क्या होगा? हर बार असफल होने पर भी उसके पिता ने कभी उसे हिम्मत नहीं हारने दी थी। वह अपने पापा को किसी भी क़ीमत पर दुःखी नहीं करना चाहती थी, पर कोई दूसरा रास्ता भी नहीं सूझ रहा था।
ये सब सोचते हुए उसके दिमाग में जैसे बिजली सी कौंध गई! उसने पर्स में पड़े पैसों की तरफ़ देखा। चूँकि उसके बहुत ख़र्चे नहीं थे, इसलिए कुछ पैसे जमा हो गए थे। तभी उसे एक विचार आया—'अगर मरना ही है, तो क्यों न कुछ दिन खुलकर जी लिया जाए! वे सारी इच्छाएँ पूरी कर ली जाएँ जो जीवन में कभी नहीं कीं।'
सबसे पहले उसने एक स्मार्टफोन खरीदा, जिसे वह अब तक फिजूलख़र्ची और मन भटकाने का ज़रिया समझती थी। पर बाद में उसे समझ आया कि यदि इसका सही उपयोग किया जाए, तो इससे अच्छा मित्र कोई और नहीं हो सकता। फिर उसने अपने लिए सुंदर कपड़े खरीदे और ब्यूटी पार्लर जाकर खुद का मेकओवर करवाया।
अचानक वह बिल्कुल नए रूप में नज़र आ रही थी। जब उसने आईने में खुद को देखा, तो यकीन ही नहीं कर पाई कि यह वही दिव्या है! इसके बाद उसने उन दोस्तों को, जो उससे अलग-थलग हो चुके थे, एक रेस्तराँ में मिलने के लिए बुलाया और छोटी सी पार्टी दी। वहाँ उसने अपनी सारी परेशानियाँ और मन का गुबार अपने दोस्तों के साथ साझा किया।
दोस्तों ने उसे हिम्मत दी और कई उपयोगी सुझाव भी दिए। वे दिव्या का यह नया, जीवंत रूप देखकर अचंभित थे और खुश भी कि उनकी पुरानी दिव्या वापस लौट आई है। नीतेश की तो खुशी का ठिकाना न रहा जब दिव्या ने उसका हाथ पकड़कर अपने बगल वाली कुर्सी पर बिठाया और साथ में लंच किया। अपनों का प्यार और अपनापन पाकर दिव्या की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए। वास्तव में, इतनी खुश वह पहले कभी नहीं हुई थी।
अंततः वह समझ पाई कि जीवन की समस्याओं को सिर्फ़ भावनाओं से नहीं, बल्कि सूझ-बूझ और व्यावहारिक दृष्टिकोण से सुलझाना चाहिए। साथ ही, हर नए बदलाव को परखने के बाद ही उसके उचित या अनुचित होने का निर्णय लेना चाहिए।
अब यही जीवन उसे बेहद ख़ूबसूरत लगने लगा था। नीतेश ने भी उसका हाथ थामकर भरोसा दिलाया कि हर मोड़ पर वह उसके साथ है। अब दिव्या का आत्मविश्वास पहले से कहीं अधिक बढ़ चुका था। वह एक बार फिर नए सिरे से, दोगुने उत्साह के साथ अपनी तैयारी में जुट गई—जहाँ अब वह अकेली नहीं थी, बल्कि उसके साथ दोस्तों का सहयोग, तकनीक का माध्यम और उसकी खुली सोच थी।

- डॉ. कुमारी सोनी (सोनिया अनंत)
       नालंदा, बिहार 





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