आजकल...(छंदमुक्त) - अशोक ' दर्द '

आजकल...
आँखों पर पट्टियाँ बाँधकर दौड़ में
शामिल हैं लोग,
दिल पर अपने हाथ रखकर भी अब
सच नहीं कह पाते,
अंधेरों में सिर पटकते हुए
उजालों की कहानियाँ बाँच रहे हैं लोग।
हवा का रुख़
भाँपे बिना महज़ तिलिस्म में उड़ रहे हैं,
ख़ुद को बेचना है बस
इसी सोच को पाल-पोस रहे हैं लोग।
बाज़ारवाद के भ्रामक सपनों के बीज
चाहतों की टोकरियों में भर,
धरती बंजर हो जाएगी यह सोचे बिना ही
बिखेरने में लगे हैं लोग।
पैसा बटोरने की होड़ में
सारा गर्हित बाज़ार
अपने-अपने चोले में समेटकर
अपनी-अपनी देहलीज़ तक ले आए हैं।
संवेदनाओं की सारी नमी
सूखकर हवाओं में उड़ गई है और
व्यावसायिकता के बाज़ार में
सारे संचित मानवीय मूल्य कौड़ियों के भाव
बिक रहे हैं।

— अशोक 'दर्द'
(डलहौज़ी, चंबा, हिमाचल प्रदेश)



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