अक्ष-ब्रह्म👁 (कविता) - चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा 'अकिंचन'

अक्षों में भी वाक् है, वाचिक 'मूक' और 'वाचाल',
'अक्ष', 'अक्ष' के सह-संयोजन लाते हैं भूचाल।

नयना नर्तन करते निश-दिन, अनंग मृदंग बजाते,
सुर-देवी सरगम सजवातीं, हैं पलक वर्तनी वरतें।

अभंग-भंगिमा भाव-पूर्ण, कवि कविता के कुंज,
हैं दर्श कराते ये जीवन-दर्शन, बन ऊर्जा के पुंज।

दृग लोकित करवाते जग को, सृष्टि दृष्टि में बसते,
विभो विभूषित, ऋषिवत् लोचन 'खं' ब्रह्म में रमते।

अजर, अमर हैं, अक्ष अक्षर हैं, ऐसे अज को जानो,
'तमसो मा ज्योतिर्गमय', "अक्ष" ब्रह्म-तुल्य हैं मानो।

'महाजनो येन गतः स पंथाः', ये शुचिकर पथ बतलाते,
पश्य कराते, पथ दिखलाते, हैं 'पश्यन्ती' कहलाते।

संधि करें, नमः-अज को जोड़ें, क्या कहते इसे नमाज़,
नमन करें हम या सिजदा, क्यों लड़ता आज समाज?

यक्ष, रक्ष हों या नर-किन्नर हों, देव, दनुज या दानव,
गंधर्व, अप्सरा अलौकिक हों या लौकिक हों मानव।

नहीं "अकिंचन" रहें जगत में, सब ही कंचन बरसावें,
प्रज्ञावान बनें सब थिरकें अरु ज्ञान-कलश छलकावें।

— चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा 'अकिंचन'

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