भाव घायल हुए, शब्द आते नहीं,
इसलिए आज हम गीत गाते नहीं!
जो थे अपने, वही अब पराए हुए,
घात बैठे हैं अब वो लगाए हुए,
यह वजह, उनके कूचे में जाते नहीं,
इसलिए आज हम गीत गाते नहीं!
जिनको दी रौशनी, तीरगी दे रहे,
आज ग़म से भरी ज़िंदगी दे रहे,
ज़ख़्म उनके दिए हम भुलाते नहीं,
इसलिए आज हम गीत गाते नहीं!
कितने चेहरे लिए लोग फिरते यहाँ,
थोड़ा पाने को नज़रों से गिरते यहाँ,
हम तो चेहरे पे चेहरा लगाते नहीं,
इसलिए आज हम गीत गाते नहीं!
— अर्जुन प्रभात
मोहद्दीनगर, बिहार
शिक्षा - स्नातकोत्तर ( अंग्रेजी)
लेखन - गद्य और पद्य की विविध विद्याओं में सक्रिय लेखन
प्रकाशन - विविध विद्याओं में एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित
संपादन - प्रतिष्ठित पत्रिका मंदाकिनी का 25 वर्षों तक संपादन
पुरस्कार / सम्मान - देश की अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा विविध सम्मानों/ पुरस्कारों से सम्मानित - पुरस्कृत
संप्रति - इंटर कॉलेज में प्राचार्य