खा के मोटा अपना अब वो तन कर रहे हैं,
हमने सुना है कि वो गबन कर रहे हैं।
आते नहीं हैं ज़द में किसी क़ायदे की,
सीने में कई राज़ दफ़न कर रहे हैं।
हाथ है सिर पर किसी आका का उनके,
इंसानियत का अपने पतन कर रहे हैं।
ओढ़े हुए हैं चेहरा किसी पारसा का,
मासूमियत का सीधे दमन कर रहे हैं।
दिखते हैं वैसे सूट और बूट में ही,
कुर्ते के अपने बंद बटन कर रहे हैं।
धंधे हैं सारे नंबर दो के ही उनके,
इकट्ठा तभी तो इतना धन कर रहे हैं।
— किशोर छिपेश्वर "सागर"
बालाघाट , मध्यप्रदेश
Tags
ग़ज़ल