यार! पेड़ मत काट,
बाँध ले यह आज गाँठ,
जो तू धरा को सताएगा,
तेरा क्षरण हो जाएगा!
खोकर सहारे सारे,
भटकेंगे मारे-मारे,
फैलेगी महामारी,
लू से कौन बचाएगा?
बिना छाया-हरियाली,
होगी धरा ख़ाली-ख़ाली,
जड़ी-बूटी, फूल, फल,
कहाँ तू उगाएगा?
जंगल मिटाने वाले,
बस्तियाँ बसाने वाले!
बस्ती बसा-बसा तेरी,
तू हस्ती मिटाएगा!
— संदीप मदन गुरु "बोरना"
मध्यप्रदेश
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कविता