थूकने की आज़ादी ( व्यंग्य) - महेन्द्र तिवारी


भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र का सीधा-सा अर्थ है पूर्ण आज़ादी। हमें अपनी बात कहने की आज़ादी है, अपनी पसंद के कपड़े पहनने की आज़ादी है, लेकिन आज कुछ लोग हमारी एक बेहद मौलिक और सदियों पुरानी आज़ादी पर हमला कर रहे हैं—वह है कहीं भी, कभी भी और किसी भी दिशा में थूकने की आज़ादी! यह बड़े दुख की बात है कि आजकल हर दूसरी दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है—"यहाँ थूकना सख्त मना है"। ऐसा लगता है जैसे थूकना कोई बहुत बड़ा राष्ट्रीय अपराध हो गया हो।  
ज़रा सोचिए, थूकना हमारी महान सांस्कृतिक परंपरा का कितना अभिन्न हिस्सा रहा है। किसी पर गुस्सा आए तो हम "थू" कहकर अपना क्रोध जताते हैं। किसी को नज़र लग जाए तो "थू-थू" करके उसे बुरी बला से बचाते हैं। और अगर पान या गुटखे का आनंद लेना हो, तो उसके बाद की कलाकारी दीवारों पर उकेरकर हम अपने अंदर छिपे पिकासो को बाहर लाते हैं। यह एक बहुआयामी और चमत्कारी क्रिया है। इसे रोकना हमारी मौलिक रचनात्मकता की हत्या करने जैसा है।  
दफ़्तरों की सीढ़ियों के कोने इस बात के मौन गवाह हैं कि हमारे देश का नागरिक कितनी मेहनत करता है। वह काम के बोझ तले दबता है, लेकिन जब वह सीढ़ियों के कोने में अपनी लाल पीक छोड़ता है, तो मानो अपनी सारी थकान वहीं त्याग देता है। आजकल प्रशासन और नगर निगम वाले कुछ ज़्यादा ही सक्रिय हो गए हैं। चौराहों और फुटपाथों पर ऐसे बोर्ड लगा दिए गए हैं कि थूकने पर भारी जुर्माना लगेगा। हद तो तब हो जाती है जब गलियों और दफ़्तरों में सीसीटीवी कैमरे लगा दिए जाते हैं।  
आप खुद कल्पना कीजिए कि कोई सीधा-सादा आदमी अपने पान का रस बड़ी नज़ाकत से दीवार के कोने में विसर्जित कर रहा हो और कैमरे में उसकी यह मासूम हरकत कैद हो जाए। अगर उसकी पत्नी ने वह फुटेज देख ली, तो वह ताना मारते हुए यही कहेगी—"अच्छा, तो आपका ऑफिस का ओवरटाइम रोज़ इसी कोने में चल रहा था!"  
कुछ लोगों का कुतर्क है कि थूकने से गंदगी फैलती है। अब यह बात गले से नीचे नहीं उतरती। हमारे शहरों में प्लास्टिक का कचरा है, गाड़ियों का ज़हरीला धुआँ है, लेकिन सारा दोष उस बेचारे पान के रंग पर मढ़ दिया जाता है। सच तो यह है कि सरकारी इमारतों की फीकी और उदास दीवारों पर पान की पीक एक आधुनिक कला की तरह निखरकर आती है। अगर सरकार चाहे तो कुछ पुरानी लाल हो चुकी इमारतों को 'थूक महल' का नाम देकर वहाँ टिकट लगा सकती है। इससे विदेशी पर्यटक भी हमारी इस अद्भुत कला को देखने आएंगे और देश का राजस्व भी बढ़ेगा।  
स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी हमेशा कहते हैं कि शरीर के अंदर का ज़हर बाहर निकालना चाहिए। अब अगर आम आदमी इस ज़हर को सड़क किनारे न निकाले, तो कहाँ लेकर जाए? इससे तो सड़क पर एक तरह की प्राकृतिक चमक भी आती है। जब तेज़ बारिश आती है, तभी यह लाल रंग धुलता है—जिसे हम जल-चक्र की तर्ज पर 'थूक-चक्र' भी कह सकते हैं।  
मेरा प्रशासन से एक बहुत ही सीधा और सरल प्रस्ताव है। पाबंदी लगाने से हमेशा बग़ावत ही होती है। इसलिए इस कला को व्यवस्थित किया जाना चाहिए। जिस तरह पार्कों में लोगों के टहलने के लिए जॉगिंग ट्रैक बनाए जाते हैं, ठीक उसी तरह हर मोहल्ले, चौराहे और दफ़्तर में 'थूक ट्रैक' या 'थूक कॉर्नर' बनने चाहिए। वहाँ लोग शांति से बैठकर दुनिया भर की चर्चा कर सकें और अपनी कला का बेखौफ प्रदर्शन कर सकें।  
जिस देश में लोग अपने छोटे-छोटे अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर आते हैं, वहाँ थूकने के इस पवित्र अधिकार को इतनी आसानी से नहीं छीना जाना चाहिए। अगर अगली बार कोई आपको दीवार लाल करने से रोके, तो सीना तानकर कहिए कि "जनाब, यह हमारी आज़ादी का मामला है!" अगर हमने आज अपनी यह आज़ादी नहीं बचाई, तो आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी कि एक सुनहरा दौर ऐसा भी था जब भारत के लोग खुले आसमान के नीचे बेखौफ़ होकर थूकते थे—और वे हमारी इस खोई हुई आज़ादी पर बहुत हँसेंगे।  


-महेन्द्र तिवारी  

कहानी संग्रह - 'एक लेखक का पुनर्जन्म' (शीघ्र प्रकाश्य)
काव्य संग्रह - प्रकृति और जीवन (शीघ्र प्रकाश्य)
विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कविताएँ एवं कहानियों का निरंतर प्रकाशन
संपादन: दि ग्राम टुडे 'लघुकथा विशेषांक' (अतिथि संपादक)
साझा संकलन: लगभग पचास साझा संकलन में सहभागिता
सम्मान: 'काशी साहित्यिक संस्थान ट्रस्ट' द्वारा कविता के लिए सम्मान पत्र (2026)
कार्य क्षेत्र: भूतपूर्व वायुसैनिक, वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत
ई-मेल: mahendratone@gmail.com
संपर्क: 216 बी, द्वितीय तल, राधिका ज्वेलर्स के पास, गली नंबर-10, साध नगर, पालम, नई दिल्ली - 110045


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