सावन से रोमानियत,
सावन से है प्रीत,
बूंदों की शहनाइयाँ,
कुदरत का संगीत।
सावन मास शिवत्व का,
शिव हैं पालनहार,
गरलपान से ही बना,
यह सुखमय संसार।
हरी मखमली सेज पर,
लेटी वसुधा-नार,
नभ झुक अभिवादन करे,
छेड़े राग मल्हार।
गगन घटा घहरा रही,
बिखरे काले केश,
आँसू टप-टप टपकते,
कंत गए परदेश।
पानी, गुड़धानी न दें,
मेघ बजाते गाल,
खेत-किसान, नदी-नहर,
सूखे से बेहाल।
बादल, बिजली, बारिशें,
रिमझिम मूसलधार,
झूले में बहने लगी,
कजरी की रसधार।
उमड़-घुमड़ मनुहार कर,
मेघ मल्हार सुनाए,
भीतर तक भीगी धरा,
गोद हरी हो जाए।
निहुर-निहुर बनिहारिनें,
रोप रही हैं धान,
रुनझुन छागल-चूड़ियाँ,
हरी-हरी मुस्कान।
गर्जन-तर्जन कालिमा,
निशा करे बेचैन,
नित्य विरहिणी तड़पती,
सुन 'पपिहे' के बैन।
छाजन टप-टप चू रही,
छिजता गया हुलास,
ज्योति आस की बुझ चली,
दरक गया विश्वास।
खुशबू, फूल, हरीतिमा,
में सत-चित-आनंद,
हरियाली के दरमियान,
मुखरित हों स्वर-छंद।
हरी हँसी हर खेत में,
चपल नदी लहराए,
झरे सदा हर होंठ से,
हरसिंगार गदराए।