बूंँदों की शहनाइयांँ( सावनी दोहे) - भगवती प्रसाद द्विवेदी

​सावन से रोमानियत,

सावन से है प्रीत,

बूंदों की शहनाइयाँ,

कुदरत का संगीत।


​सावन मास शिवत्व का,

शिव हैं पालनहार,

गरलपान से ही बना,

यह सुखमय संसार।


​हरी मखमली सेज पर,

लेटी वसुधा-नार,

नभ झुक अभिवादन करे,

छेड़े राग मल्हार।


​गगन घटा घहरा रही,

बिखरे काले केश,

आँसू टप-टप टपकते,

कंत गए परदेश।


​पानी, गुड़धानी न दें,

मेघ बजाते गाल,

खेत-किसान, नदी-नहर,

सूखे से बेहाल।


​बादल, बिजली, बारिशें,

रिमझिम मूसलधार,

झूले में बहने लगी,

कजरी की रसधार।


​उमड़-घुमड़ मनुहार कर,

मेघ मल्हार सुनाए,

भीतर तक भीगी धरा,

गोद हरी हो जाए।


​निहुर-निहुर बनिहारिनें,

रोप रही हैं धान,

रुनझुन छागल-चूड़ियाँ,

हरी-हरी मुस्कान।


​गर्जन-तर्जन कालिमा,

निशा करे बेचैन,

नित्य विरहिणी तड़पती,

सुन 'पपिहे' के बैन।


​छाजन टप-टप चू रही,

छिजता गया हुलास,

ज्योति आस की बुझ चली,

दरक गया विश्वास।


​खुशबू, फूल, हरीतिमा,

में सत-चित-आनंद,

हरियाली के दरमियान,

मुखरित हों स्वर-छंद।


​हरी हँसी हर खेत में,

चपल नदी लहराए,

झरे सदा हर होंठ से,

हरसिंगार गदराए।



- भगवती प्रसाद द्विवेदी 
सर्जना, बिस्कुट फैक्ट्री रोड, मगध आईटीआई के निकट,
नासरीगंज, दानापुर,
पटना-801 503(बिहार)
ईमेल:dubeybhagwati123@gmail.com 

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