आओ सब मिल आज़ादी का पुण्य पर्व मनाएँ,
भारत माता के पावन चरणों में अपना शीश नवाएँ।
भारत माता के चरणों में फिरंगी बेड़ियाँ पड़ी थीं,
200 वर्षों तक माँ अपने घर में क़ैद पड़ी थी!
फिरंगी का क्रूर शासन कहर ढा रहा था,
पराधीन जन-गण कष्ट भोग रहा था।
जागा जोश आज़ादी का वीरों में,
जनता के ख़ून में उबाल हुआ,
'भारत छोड़ो' फिरंगी भागे,
भारत फिर आज़ाद हुआ!
15 अगस्त सन् '47 इतिहास में दर्ज हुआ,
घर-घर मनी ख़ुशियाँ, दिवाली सब मनाएँ।
लगे लोग ख़ुशी में नाचने-गाने, हर्ष मनाएँ,
सभी मिल-बाँट मिठाइयाँ खाएँ।
अक्षुण्ण रहे बलिदानी आज़ादी हमेशा,
अपनी आज़ादी को हरगिज़ न खोने देंगे!
प्रतिवर्ष सब तिरंगे के नीचे क़सम खाएँ,
हम रहेंगे एक, फिर गुलाम न होने देंगे!
देश प्रगति-पथ पर सतत बढ़े,
सबकी यही कामना हो,
न हो किसी में परस्पर दुर्भावना हो।
हर जन में देशप्रेम, मातृ-भाव हो,
आज़ादी के जो दीवाने फाँसी चढ़े,
उनके प्रति श्रद्धा का भाव हो।
हो गए जो शहीद देश के लिए,
आओ उनका सम्मान करें,
धरती, अंबर, दसों दिशाओं में,
उनकी वीरता का गुणगान करें!
— राजेंद्र सहनी
बैरगनिया, सीतामढ़ी