हिंदी की समकालीन महिला ग़ज़लकारों में रूबी गुप्ता सत्येंद्र का नाम बहुत जाना-पहचाना नहीं है, लेकिन उनकी सद्यःप्रकाशित ग़ज़ल की किताब 'ज़रा आबाद होना है' से गुज़रने के बाद यह महसूस होता है कि उनके पास ग़ज़ल के तौर-तरीके और सलीका सब कुछ है। उनकी शायरी में वह गहराई है, अनुशासन, तकनीक, कथ्य और मुहावरा है, जो एक अच्छी ग़ज़ल की पहचान हो सकती है। कम बोलना और ज़्यादा कहना ग़ज़ल की ख़ूबी है, जो रूबी गुप्ता की शायरी में भी मौजूद है—
आपसे मिलके और क्या होगा
गुफ्तगू होगी, मसअला होगा
यह एक ज़िंदगी की बड़ी हक़ीक़त और तल्ख़ सच्चाई है, जिसे एक छोटी बहर के शेर में उन्होंने निपुणता से रख दिया है।
उनके पास शब्द हैं, नई भाव-भंगिमा है और भाषा की ताज़गी भी है—
क्या इसके सिवा क़ीमती मैं माँगती रब से
उसने ही नवाज़ा मुझे अम्मा के लक़ब से
माँ पर जितने शेर कहे गए, यह शेर उससे बिल्कुल अलाहिदा है। शायरा क़ुदरत के दिए हुए इस अनमोल तोहफ़े का नायाब तरीक़े से शुक्र अदा करती हैं।
उनके कई शेर बहुत आसान होते हुए भी एक गहराई रखते हैं और हमें उस आभासी दुनिया से परिचय करवाते हैं, जिसे हमने नज़रअंदाज़ कर रखा है। कुछ शेर देखें—
जीवन क्या वनवास नहीं है
या तुमको आभास नहीं है
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एक मुद्दत से गुमशुदा है वो
अब तो उसकी ख़बर ज़रूरी है
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ख़ुदी को हारकर दुनिया मिले तो
हमारी जीत है बेकार साहब
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बात मेरी भी मानिए साहब
इक नज़र ख़ुद पे डालिए साहब
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आप एक बार मुस्कुरा देते
हम भी शिकवे-गिले भुला देते
'ज़रा आबाद होना है' में सत्तर से अधिक ऐसी ही कसी हुई ग़ज़लें हैं, जो शायरा की और ग़ज़लें पढ़ने की चाहत पैदा करती हैं और हमारा दिल उनकी शेरो-शायरी का मुरीद बन जाता है। हाँ, इतना ज़रूर है कि एजुकेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली उर्दू का तो एक बड़ा प्रकाशक है, लेकिन हिंदी में उसे टाइपिंग और सेटिंग सीखने की ज़रूरत है। कई ऐसे शब्द जो एक शिरोरेखा में होने चाहिए, उनका अलग-अलग कर दिया जाना अध्ययन और संप्रेषण में बेहद खटकता है।
- डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री
पुस्तक: ज़रा आबाद होना है
विधा: ग़ज़ल
शायरा: रूबी गुप्ता सत्येंद्र
वर्ष: 2026, मूल्य: ₹250 (हार्ड कवर)
पृष्ठ: 142
प्रकाशक: एजुकेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली
समीक्षक:
माफ़ी, अस्थावाँ, नालंदा - 803107
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