पावन धरणी की मिट्टी को,
जिसने अपना तिलक बनाया,
और लहू की बूँद-बूँद से,
सींच-सींचकर वतन सजाया!
'भारत माँ की जय' दहाड़कर,
जिन्होंने गोली हँसकर खाई,
नमन भारती के उन वीरों को,
जिसने राखी की लाज बचाई।
कैसे नव उत्सव भरें उनमें हम,
जिसने अपना सिंदूर गँवाया!
भारत माँ का लाल था सच्चा,
देश की ख़ातिर घर नहीं आया।
सिर पर कफ़न बाँध चले थे,
भारत माँ के लाल वे प्यारे,
उन वीर शहीदों के आगे,
श्रद्धा से सिर झुके हमारे!
छोड़ा था घर-बार जिन्होंने,
सरहद पर घर-बार बसाया,
जान गँवाकर भी अपनी,
तिरंगे को अमर बनाया!
भूल सकेगा न कोई जग में,
ऐसे वीर बलिदानी को,
रखेगा इतिहास हमेशा,
याद इनकी कुर्बानी को!
— वर्षा वसी
नालंदा, बिहार