अपनी मेहनत से मुअत्तर है बगीचा अपना,
हम हैं मज़दूर, महकता है पसीना अपना।
राह हमवार न हो तो भी पहुँच जाते हैं,
साथ क़दमों के चला करता है जज़्बा अपना।
सबके चेहरों पे बताता है जो धब्बे अक्सर,
उसने आईने में देखा नहीं चेहरा अपना।
यूँ अलग राह चुनी दोनों ने मर्ज़ी से मगर,
आज भी उससे है बेनाम-सा रिश्ता अपना।
वक़्त के साथ क़दम-ताल करेगा कैसे,
जिसने अब तक नहीं बदला है नज़रिया अपना!
— अशोक श्रीवास्तव
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