मानवता द्वारा गुप्त जी को शत-शत नमन (कविता) - टी. के.


युग में एक बार कवि आते, मन को राह दिखाने को।
किंतु यहाँ पर लोग लगे हैं, निज शक्ति आज़माने को।

पहन रखी है लाल लंगोटी, कहता महावीर हूँ मैं।
उसे पता क्या कैसा है वह, फटा ढोल, ज़री/चीर है वह।

दिनकर, जयशंकर प्रसाद या कहो निराला, शूर नहीं?
महादेवी वर्मा को पढ़ लो, देखो दिल्ली दूर नहीं।

अभी कहूँ किसको मैं हितकर, कौन यहाँ बैरी है जी।
जब तक नहीं जागे हो प्रियवर, तब तक ही देरी है जी।

मैथिलीशरण प्राण हिंदी के, और निराला हृदय रहे।
धमनी में जो रक्‍त बहा दे, उन्हें यहाँ दिनकर समझें।

आँसू बहते जब नयनों से, महादेवी वर्मा को सुनें।
कहने वाले बहुत कह गए, वे निकाल देते अवगुण।

आज जयंती पर हम आए, शरण महाकवि के आगे।
पालन करो, महामानव हो, वही जो गए समझा के।


— टी. के. पांडेय
प्रबंधक( अवकाश प्राप्त) 
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया । 
इंद्र प्रस्थ (दिल्ली) 
स्थायी पता
भागलपुर, विक्रमशिला कॉलोनी। 
म न १८
बिहार

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