"राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत-भाग्य-विधाता है,
फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन हरचरना गाता है!"
20वीं सदी के उत्तरार्द्ध के भारतीय साहित्य में रघुवीर सहाय (1929–1990) एक ऐसा अद्वितीय और ओजस्वी नाम हैं, जिन्होंने हिंदी कविता को दरबारों, सौंदर्य-वर्णन और कोरी भावुकता से निकालकर आधुनिक समाज के यथार्थ, राजनीति और आम आदमी की लाचारी से सीधा जोड़ा।
लखनऊ में जन्मे और पेशे से प्रखर पत्रकार रहे रघुवीर सहाय जी 'दूसरा सप्तक' के प्रमुख कवि थे। प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका 'दिनमान' के संपादक के रूप में उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को एक नया वैचारिक आयाम दिया। उनकी रचनाएँ आज भी हमारे सामाजिक और राजनीतिक तंत्र पर सीधा प्रहार करती हैं।
रघुवीर सहाय जी की कविता का मुख्य स्वर राजनीतिक चेतना, जनतंत्र की विसंगतियाँ और आम नागरिक की विवशता है। वे भारी-भरकम और क्लिष्ट शब्दों के बजाय दैनिक बोलचाल की भाषा में बहुत तीखा और मारक व्यंग्य करते हैं।
उनकी प्रसिद्ध कविता 'अधिनायक' स्वतंत्र भारत के जनतंत्र में आम आदमी की स्थिति पर सबसे बड़ा प्रहार है:
"राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है,
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है!"
वे पाठकों को चौंकाते हैं कि जिस 'हरचरना' (आम नागरिक) के पास पहनने को ठीक से कपड़े भी नहीं हैं, वह भी सत्ता के दबाव में 'भाग्य-विधाता' का गुणगान करने पर मजबूर है।
1982 में प्रकाशित उनका काव्य-संग्रह 'लोग भूल गए हैं' आधुनिक हिंदी कविता का एक मील का पत्थर है। इस कालजयी कृति के लिए उन्हें वर्ष 1984 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
उनकी अन्य प्रमुख कृतियाँ—'आत्महत्या के विरुद्ध', 'हँसो, हँसो, जल्दी हँसो', और 'सीढ़ियों पर धूप में'—आधुनिक मानव की विडंबनाओं और समकालीन राजनीति के स्याह पक्ष को उजागर करती हैं।
रघुवीर सहाय जी केवल राजनीतिक कवि ही नहीं थे, बल्कि वे मानवीय संबंधों और संवेदनाओं के बहुत सूक्ष्म पारखी थे। उनकी कविताओं में नाटकीयता और संवाद-शैली का बहुत सुंदर प्रयोग मिलता है। वे लिखते हैं:
"कुछ होगा कुछ होगा अगर मैं बोलूँगा
न टूटै न टूटै तिलस्म सत्ता का
मेरे अंदर का कायर तो टूटेगा।"
यह पंक्तियाँ स्पष्ट करती हैं कि उनके लिए लिखना केवल कला का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाना और अपने भीतर के डर को खत्म करना था।
एक पत्रकार होने के नाते रघुवीर सहाय जी की नज़र समाज की हर छोटी-बड़ी घटना पर रहती थी। उन्होंने साहित्य को 'खबर' की सादगी दी और खबर को 'साहित्य' का स्थायित्व दिया। उन्होंने अपनी कविताओं में समसामयिक घटनाओं को उठाकर उन्हें कालजयी बना दिया।
रघुवीर सहाय जी का साहित्य हमें यह सिखाता है कि नागरिक के रूप में चुप रहना सबसे बड़ा अपराध है। आज के दौर में, जब मीडिया और समाज में आम आदमी के सवाल कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं, तब रघुवीर सहाय जी की कविताएँ हमें आँखें खोलकर सच देखने और सवाल पूछने का साहस देती हैं।
- बोधायन पत्रिका
Tags
कालजयी रचनाकार