सबसे अच्छा मित्र (लघुकथा) - किरण परशुराम चतुर्वेदी


सौम्या ने हाल ही में अपने जीवन के अठारह वर्ष पूरे कर उन्नीसवें वसंत में कदम रखा था। अपने गाँव से अकेली अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाई करने वाली लड़की होने का एक अलग ही दबाव था। मंच पर जाते ही घबराहट से काँपने की अपनी इस कमज़ोरी को कैसे छुपाए, इसी उधेड़बुन में वह अपनी हमउम्र दोस्त नेहा से चर्चा कर रही थी। पर दोनों ही किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पा रही थीं।  
नेहा ने सुझाव दिया, "क्यों न आरती आंटी, यानी तुम्हारी मम्मी से इस बारे में सलाह ली जाए?"  
मम्मी का नाम सुनते ही सौम्या तिनक उठी, "हूँ! वो भी पढ़ाई-लिखाई के मामले में मुझे सलाह देंगी!"  
सौम्या की माँ, आरती, पास ही खड़ी यह सब सुन रही थीं। पर वे चुप ही रहीं। वे जानती थीं कि आज की पीढ़ी अक्सर अपने माँ-बाप को पुरानी सोच का समझ लेती है, और जब बात मंच, भाषण या तकनीक की हो, तो उनकी सलाह की गुंजाइश ही कहाँ बचती है! आरती मन ही मन सोच रही थीं कि सौम्या का यह डर कैसे दूर किया जाए, तभी उन्हें नेहा बाहर जाती दिखी।  
आरती ने पुकारा, "अरे नेहा बेटा, कैसी हो?"  
"ठीक हूँ आंटी," नेहा ने छत की ओर ताकते हुए अनमने भाव से कहा।  
"15 अगस्त आ रहा है, तुम लोगों ने किसी कार्यक्रम में भाग नहीं लिया क्या?"  
"लिया तो है आंटी, नाटक में। पर मंच पर बोलते ही गला सूखने लगता है, बस इसी बात का डर है। सरकारी स्कूल है न मेरा! मैडम का मन हुआ तो कुछ बता देंगी, नहीं तो दिन भर फोन में ही लगी रहती हैं..."  
आरती ने अपनी आवाज़ में ममता और आत्मीयता घोलते हुए कहा, "तुझे पता है नेहा, जब मैं नौवीं कक्षा में थी, तब दोस्तों की ज़िद पर पहली बार मंच पर गई थी। सामने लोगों की भीड़ देखते ही मेरे हाथ-पाँव काँपने लगे और मैं सारे संवाद भूल गई। तब हमारी शिक्षिका ने मुझसे कहा था—'बेटा डरना मत। बस यह सोचना कि सामने कोई नहीं है, केवल तुम्हारे शब्द हैं जो हवा में गूँज रहे हैं।' बस फिर क्या था, उस दिन मैंने ऐसा भाषण दिया कि सब देखते रह गए!"  
यह सुनकर नेहा और आरती दोनों हँस पड़ीं। इस हँसी में एक माँ का अनुभव और भटकते बच्चों के लिए सही दिशा छिपी थी।  
15 अगस्त के दिन सौम्या सुबह-सुबह फटाफट तैयार हुई। स्कूल के लिए निकलते समय उसने रोज़ के विपरीत आज अपनी माँ को मुस्कुराकर "बाय" कहा।  
शाम के चार बज चुके थे। घर के सारे काम निपटाकर आरती टीवी पर देशभक्ति गीत सुनते हुए कुछ विचारों में खोई हुई थीं। तभी सीढ़ियों पर आहट हुई। आरती झट से दरवाज़े के पास पहुँचीं और सौम्या के खिलते चेहरे को निहारते हुए बोलीं, "आने में थोड़ी देर हो गई न तुझे? ज़ोर की भूख लगी होगी, चल मैं खाना लगाती हूँ।"  
सौम्या ने अपनी माँ को कसकर गले लगा लिया। उसकी आँखों से छलकते आँसुओं में आभार था। वह रोते हुए बोली, "आई एम सॉरी माँ... आप ही मेरी सबसे अच्छी दोस्त हैं!"  
तभी पृष्ठभूमियों में टीवी पर बज रहे गीत "दिल दिया है, जाँ भी देंगे..." के अंत में उद्घोषक की आवाज़ गूँजी—"हमारा देश हमारी माँ की तरह है—गुरू, संबल और सबसे सच्चा मित्र!"  


- किरण परशुराम चतुर्वेदी 
     भभुआ, बिहार 

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