सन् सत्तावन की क्रांति-लहर!
जय वीर कुँवर! जय वीर कुँवर!
वह आज़ादी का दीवाना,
वह दीप-शिखा का परवाना।
वह तेग लिए असवार अश्व,
वह अंग्रेज़ों हित घोर कहर!
जय वीर कुँवर! जय वीर कुँवर!
जिस ओर मुड़ा, मैदान साफ़,
दुश्मन की हड्डी गई काँप।
यह देश मुक्त होगा कैसे?
सोचा करता था आठ पहर।
जय वीर कुँवर! जय वीर कुँवर!
जब लगी हाथ में थी गोली,
तब भी टन्नक उसकी बोली—
गंगा मइया! लो अर्पित, यह
करता प्रयाण, धर लिया डगर।
जय वीर कुँवर! जय वीर कुँवर!
— हरिनारायण सिंह 'हरि'
समस्तीपुर, बिहार
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गीत