ज्यों ही रात के बारह बजे, रमेश जी ने पत्नी रमणी का माथा चूमते हुए ताली बजाना शुरू कर दिया, "हैप्पी बर्थडे टू यू डियर रमणी... हैप्पी बर्थडे टू यू...!"
रमणी की आँखें खुलते ही रमेश ने उनके हाथों को अपने हाथ में लेते हुए कहा, "मैम! आज आपके बानबे वर्ष पूरे हो गए। आज शाम को हम एक बड़ी पार्टी रखेंगे आपके आत्मीय प्यार के नाम।"
"छोड़ो भी! अभी तो हाल में ही तुम्हारे जन्मदिन की पार्टी हुई थी, जब तुम्हारी ज़िंदगी के नब्बे वसंत पूरे हुए थे और हमारी जोड़ी की तुलना बा-बापू से की गई थी। कस्तूरबा, गांधी जी से बड़ी थीं न? हमारी युगल जोड़ी भी वैसी ही...!" रमणी ने अधरों पर गुलाब खिलाते हुए कहा था।
"आज की पार्टी उससे भी ग्रैंड होगी — तुम जियो हज़ारों साल, साल के दिन हों पचास हज़ार!" रमेश शायराना अंदाज़ में शेरो-शायरी सुनाने लगे। रमणी का दिल बाग़-बाग़ हो उठा। उनके मन में ख़ुशियों के लड्डू फूट रहे थे, मगर उन्होंने कुछ सँभलकर कहा, "बग़ल के कमरे में बेटे-बहू-पोते सो रहे हैं, उनका भी तो ख़्याल करो।"
"मोहब्बत और जंग में सब कुछ जायज़ होता है, मैडम! हम नब्बे-बानबे के हुए तो क्या, अभी तो हम जवान हैं! तुम इस गृह की रानी और मैं राजा!" रमेश ने सफ़ाचट मूँछों पर ताव देते हुए कहा।
"राजा नहीं, महाराजा!" रमणी ने झुर्रियों भरे चेहरे पर ऐसी मुसकान थिरकाई, जैसे काँटों के बीच कली खिल उठी हो, "मगर महाराज! आपके पोपले मुँह से यूँ लार टपक रही है, मानो अमृतवर्षा हो रही हो। लाइए, मैं इसे अपने सीप-से अधर में समेट लूँ।" उन्होंने अपने आँचल से उनके मुँह को आहिस्ता से पोंछ दिया।
"आपके मुखारविंद से झरती थूक भी तो मेरे बदन को परफ़्यूम की स्प्रे जैसी सुवासित कर रही है। ऐसे अवसरों पर मैं धन्य हो जाता हूँ—
सलामत रहे दोस्ताना हमारा...!"
रमेश भावविह्वल हो उठे, "मेरी अंतिम यात्रा पर तुम अपने हाथों मुझे सजाना-सँवारना, ताकि मैं ख़ुशी-ख़ुशी महाप्रयाण कर सकूँ।"
"ख़बरदार, जो ऐसी बात की!" रमणी ने आपत्ति जताई, "मैं सुहागिन ही मरना चाहती हूँ। मुझे तुम मेरी अंतिम यात्रा के लिए तैयार करना!"
"मगर ज़रा सोचो मैम, तुम्हारे बाद मेरा क्या होगा?" रमेश ने सचमुच भावुक होकर कहा, "तुम्हीं तो मेरी प्रेरणा रही हो, जिसकी बदौलत मैं लंबा संघर्ष कर पाया और आज भी तुम्हारी छत्रछाया में ही जीवन को ज़िंदादिली से जिए जा रहा हूँ। कल को कौन जाने! चलो, अभी मैं तुम्हारा शृंगार करता हूँ और तुम मुझे सजाओ। कल की चिंता छोड़ वर्तमान में ही जीना हमारा दर्शन रहा है।"
फिर तो रमणी नई-नवेली दुल्हन की भाँति सकुचाती-लजाती रहीं और रमेश उनके अंग-प्रत्यंग को सँवारने में तल्लीन रहे। तत्पश्चात् रमणी ने भी रमेश को दूल्हे की नाईं सजाया-सँवारा और काफ़ी देर तक एक-दूसरे को एकटक देख, संतृप्ति की अनुभूति करते रहे।
फिर आलिंगनबद्ध हो, चिरनिद्रा देवी की गोद में समा गए।
आज उन दोनों की ही आख़िरी रात थी।
— भगवती प्रसाद द्विवेदी
लेखक परिचय :
जन्म स्थान: बिहार (वर्तमान निवास: दानापुर, पटना)
संक्षिप्त परिचय:
भगवती प्रसाद द्विवेदी जी हिंदी और भोजपुरी साहित्य के लब्धप्रतिष्ठित कथाकार, कवि, समालोचक और लोक-साहित्य के जाने-माने विद्वान हैं। उन्होंने बाल साहित्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। भारत सरकार के दूरसंचार विभाग से सेवानिवृत्ति के पश्चात् वे निरंतर स्वतंत्र लेखन में सक्रिय हैं।
साहित्यिक योगदान:
हिंदी और भोजपुरी में उनकी 21-21 पुस्तकें तथा बाल साहित्य की 100 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित एवं प्रशंसित हैं।
प्रमुख लघुकथा संग्रह: 'भविष्य का वर्तमान', 'थाती', 'सदी का सच' (विशेष रूप से चर्चित)।
प्रमुख कहानी संग्रह व उपन्यासिकाएंँ: 'अस्तित्वबोध', 'चीरहरण', 'फीलगुड तथा अन्य कहानियांँ', 'जिसके आगे राह नहीं', 'यातना-शिविर'।
सम्मान एवं पुरस्कार:
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 'बालसाहित्य भारती सम्मान', 'निराला पुरस्कार', 'सूर पुरस्कार'।
बिहार सरकार द्वारा 'भिखारी ठाकुर सम्मान' तथा बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् द्वारा 'विशिष्ट साहित्य-सेवा सम्मान'।
इसके अलावा 'देवपुत्र गौरव सम्मान' (इंदौर) और 'चमेली देवी महेंद्र सम्मान' (कानपुर) सहित कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से अलंकृत।
वर्तमान दायित्व:
वर्तमान में वे बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साहित्य मंत्री और अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में साहित्य-सेवा कर रहे हैं।
Tags
लघुकथा