छोटकी पूछे "बाबूजी!" (भोजपुरी कविता) - किरण परशुराम चतुर्वेदी

छोटकी जब-जब पूछे— "बाबूजी!"
हृदय रोवे, करेजा फाटे,
का बताईं, कैसे समझाईं आजु जी!
छोटकी जब-जब पूछे— "बाबूजी!"

काहे दुअरा पर लागल शोर बा?
काहे सबकी अँखियन में लोर बा?
तीन साल के नटखट गुड़िया,
का जानो, का बूझे जी!
हृदय रोवे, करेजा फाटे...

माई के दहलल घूँघट झाँके,
बेसुध दादी के गोहरावे,
चाचा, बाबा सब बाड़े रोवत,
सोचे— काहे सुतल बाड़े बाबूजी?
हृदय रोवे, करेजा फाटे...

कैसे कहीं कि रानी बिटिया,
देश के मान बढ़वले हीया!
सीना पर खइले छह-छह गोली,
तोहार रक्षा कइले तोहार बाबूजी!
हृदय रोवे, करेजा फाटे...

तोहार दादा जी के रोपल फूल,
दादी के गुँथल, माला समूल,
ई माई के बुनल धोती...
का कहें, काहे लइले नेता जी!
हृदय रोवे, करेजा फाटे...
कैसे बताईं, का बताईं आजु जी!

- किरण परशुराम चतुर्वेदी 
      भभुआ,  बिहार 

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