‘लबरा हमर उपनाम । लबरइ हमर उपकाम ।’ बिना लागलपट के बोले के हमर आदत के कारण हमरा प्रति निकट के लोग के बुझाइय कि हमरा मन मे छलकपट नहए । जे देखइछी, उहे बोलइछी ।
हर बोल के तौल के बोले वाला हमर परोसी हमरा ‘लबरा’ उपनाम देबे वाला ब्रह्मा हए । उ लोग हमरा ‘लबरइ’ के कारन नारद बुझिय । मगर हमरा लगइय जगपालक ‘विष्णु’ हमरा पर एहसान कएले हए । हुनका में घमण्ड भर देलन आ हमरा में सत्य पर विश्वास ।
एक दिन हुनका घरे चाय पर गेली । हमर पूरा परिवार साथ मे रहे । हुन बोलएले रहे । समय समय पर अइसन आदान-प्रदान नियमितता होइत रहइय।
जाइते मे जे पानी मिलल, ऊ हमरा महक गेल । घर के मालकिन से पुछली – “ कि भौजी टंकी साफ नहए कि ?”
“हे भकचोन्हारा देओर, चला अपना फाटल आँख से देखिहा कि केतना साफ हए टंकी ।” भौजाई हमरा आँख नचा के कहलथिन ।
छत पर पुगली । हाथ मे चाय के कप रहे । देखली बाहर से टंकी चमचम करइय, भौजी के लिपिस्टिक पाओडर लागल चेहरा लेखिन ।
“बाहर के साफ त तारिफे काबिल हए मगर पानी त भितरी से साफ रहे से न पिये बाला होयत ।” कहइत हम मजाक में टंकी के मुनहा खोल देली । लेकिन भितरी के हाल देख के त सबके माथा ठनक गेल। टंकी में मकडा के झोला, तेलचट्टा, पिलुआ आ चारु ओरी चिउँटी दौरइत रहे । ओहु से बरका तमासा त धमधुसर मुस मरल छताइत रहे । सबके उल्टी जेखन मन होये लागल।
इ सब देख के त मालकिन भौजी के मनो घिना गेल, सरम से आँख झुका के कहलन – “लबरा देओर के लबरइ मे त आइ बरका सिख भेट गेल – बाहर से बेसी अन्दर साफ जरुरी हए ।”
- सञ्जय साह मित्र
रौतहट, नेपाल