ज्ञान हेतु हे प्रिय अर्जुन! तुम अब अति श्रद्धावान बनो,
माया-बंधन से मुक्त बनो, दर्शन पाकर भगवान बनो!
जहाँ ज्ञान की कमी, मोह-जड़ता का केवल दर्शन होता,
हे पार्थ! जनम-दर-जनम यहाँ, यह जीव सदा हँसता-रोता।
अर्जुन बोले:
कहिए प्रियवर! निष्काम कर्म का भेद और क्या होता है?
अथवा केशव! संन्यास-कर्म से भिन्न मार्ग क्या होता है?
श्री कृष्ण बोले:
पृथक्-पृथक् इनको करना, अति कठिन धनंजय! होता है,
कहना मुश्किल है यहाँ पार्थ! कौन श्रेष्ठतम होता है!
निष्काम कर्म है सरल राह, यह नहीं कंटीली झाड़ी है,
कर्मों का संन्यास समझो, जैसे चलती तन-नाड़ी है!
प्रबंधक( अवकाश प्राप्त)
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ।
इंद्र प्रस्थ (दिल्ली)
स्थायी पता
भागलपुर, विक्रमशिला कॉलोनी।
म न १८
(हवाई अड्डा के पश्चिम दक्षिण कोने पर)
तिलकामांझी, भागलपुर, बिहार।