कथित “सभ्य” कहे जाने वाले,
समाज के कुछ चेहरे।
धीमे पग धर, आहट छिपाए,
चढ़ते हैं अंधी सीढ़ियाँ।
जा ठहरते उस दहलीज़ पर,
जिसका नाम भी लेना,
शिष्टता के विरुद्ध माना जाता है।
रात की निस्तब्धता में,
उतर जाती है उनकी सभ्यता,
भद्रता का आवरण ढल जाता है।
और उजाले में पूजे जाने वाले,
वे ही चेहरे,
अंधेरों में अपना असली रूप ओढ़ लेते हैं।
नारी को “माँ”, “बहन” कहने में,
जिनकी वाणी नहीं थकती,
वही लोग,
नज़र बदलते ही,
अर्थ बदल देते हैं हर संबोधन का।
कथित “सभ्य” कहे जाने वाले,
समाज के कुछ चेहरे।
कुछ ऐसे भी हैं—
जो न्याय की ऊँची कुर्सियों पर बैठ,
धर्म और नीति का पाठ पढ़ाते हैं।
दूसरों के अपराधों पर,
निर्दय फ़ैसले सुनाते हैं,
पर अपने ही दर्पण से,
नज़रें चुरा लेते हैं।
उनके कुकृत्य,
दबे रहते हैं,
पद, प्रतिष्ठा और संपन्नता के,
मोटे पर्दों के पीछे।
और वे फिर भी,
सम्मानित, प्रतिष्ठित,
“सभ्य” कहलाते रहते हैं।
कथित “सभ्य” कहे जाने वाले,
समाज के कुछ चेहरे।
- रंजना लता
समस्तीपुर, बिहार
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