फ़रेब - ए - लिबास (संस्मरणात्मक लघुकथा) - डॉ. प्रीति सुमन

​हिन्दी की एक प्रतिष्ठित कवयित्री एवं ग़ज़ल की शोधार्थी होने के कारण कई उर्दू के ग़ज़लकारों और संस्थाओं से मेरी आत्मीयता हो गई।

​इसी क्रम में उर्दू की एक प्रतिष्ठित संस्था के वार्षिक जलसे में बतौर कवयित्री सम्मिलित होने का आमंत्रण प्राप्त हुआ। सीतामढ़ी से पटना तक का सफ़र हमेशा की तरह आपाधापी से भरा था। समय कम होने के कारण, किसी औपचारिक साज-श्रृंगार का अवसर नहीं मिल पाया और मैं जैसे-तैसे एक साधारण सी कुर्ती-पैंट, एक ढीला-ढाला दुपट्टा गले में डाले बिना किसी बनावट के कार्यक्रम स्थल पर पहुँच गई।

​संस्था के निदेशक महोदय स्वयं बड़े आदर के साथ स्वागत में खड़े थे। दुआ-सलाम हुई, साहित्यिक बातें शुरू हुईं। हिंदी ग़ज़ल पर शोध करने के नाते उर्दू की महफ़िलों से मेरा अच्छा रिश्ता रहा है, पर हर अनुभूत चेहरे से परिचय हो—यह तो ज़रूरी नहीं।

​डायरेक्टर साहब अपनी संस्था और विशाल पुस्तकालय का अवलोकन करवा रहे थे। माहौल आत्मीय था। मैंने अपना मोबाइल एक नवीन साथी को थमाते हुए निदेशक जी के साथ एक स्मृति-चित्र लेने का आग्रह किया।

​ठीक उसी क्षण, संस्था की एक युवती, जो शायद देर से पहुँची थी, हॉल में प्रविष्ट हुई। रेशमी लिबास, सधा हुआ मेक-अप और चेहरे पर आयोजकों वाली स्वाभाविक अकड़। उसने जब एक साधारण सी पोशाक वाली स्त्री अर्थात मुझे संस्था के प्रमुख के साथ सहजता से तस्वीरें खिंचवाते देखा, तो उसकी भौंहें तन गईं। आँखों में स्पष्ट अविश्वास तैर गया—'यह साधारण सी औरत और हमारे निदेशक साहब के साथ इतनी सहज?'

​वह असहज हो उठी। वह कभी तस्वीरों के फ़्रेम के बीच से गुज़रती, तो कभी ज़बरदस्ती बीच में आकर खड़ी हो जाती, मानो अपनी उपस्थिति से मुझे उस फ़्रेम से बेदखल कर देना चाहती हो। मुझे उसकी इस बालसुलभ प्रतिस्पर्धा पर ताज्जुब हुआ, पर मैंने अपनी खामोशी से उसे अनदेखा कर दिया और फिलहाल तस्वीर लेने की इच्छा को विराम दिया।

​थोड़ी देर बाद जब सभी आमंत्रित अतिथियों को ऊपरी तल पर स्थित मुख्य सभागार की ओर ले जाया जाने लगा, तो मैंने भी सीढ़ियों की ओर कदम बढ़ाए। अचानक वह युवती एक प्रहरी की तरह मेरे आगे आ खड़ी हुई। उसने चतुरता से मेरा रास्ता इस तरह घेरा कि मैं अतिथियों के मुख्य समूह से पीछे छूट जाऊँ। उसकी आँखों में एक अजीब सा अहसास-ए-बर्तरी (श्रेष्ठता का भाव) था। सभी अतिथियों के निकलने के बाद जब वह स्त्री उनके पीछे बढ़ी, तब कहीं मुझे सभागार में जाने का अवसर मिला।

​सभागार में प्रवेश करते ही सामने वीआईपी सोफ़े बिछे थे, जिन पर मखमली गद्दियों के साथ अतिथियों के नाम की पट्टियाँ लगी थीं। थकान के कारण मैं अपने नाम वाले सोफ़े की ओर बढ़ी और बैठने ही वाली थी कि पीछे से उसकी तीखी आवाज़ सुनाई दी—

"रुकिए! आप यहाँ नहीं बैठ सकतीं।"

​मैंने पलटकर देखा। वही युवती थी, चेहरे पर वही तल्खी।

"क्यों मोहतरमा? यहाँ बैठने में क्या हर्ज़ है?" मैंने बहुत सहजता से पूछा।

​"यह जगह हमारे ख़ास और आमंत्रित अतिथियों की है, आम लोगों की नहीं। आप पीछे जाकर बैठिए," उसने आदेशात्मक लहजे में कहा।

​मैंने मुस्कुराते हुए सोफ़े की पुश्त (पीठ) पर लगी तख्ती की ओर इशारा किया, "देखिए मोहतरमा, इस पर तो मेरा ही नाम लिखा है।"

​युवती का चेहरा फ़क़ पड़ गया, पर उसका अहंकार इतनी आसानी से हार मानने को तैयार न था। उसने रूखेपन से कहा, "उठिए पहले! मैं खुद नाम चेक करूँगी, फिर बैठने दूँगी।"

​मैं शांत भाव से खड़ी हो गई। उसने सोफ़े के पीछे चिपक कर बड़े ध्यान से नाम पढ़ा। जैसे-जैसे नाम के एक-एक हर्फ़ उसकी आँखों के सामने स्पष्ट हुए, उसकी रीढ़ की अकड़ आधी ढीली पड़ गई। उसके पास नाकामी से मुस्कुराने के सिवा कोई चारा न बचा था। बुझे मन से उसने मुझे बैठने का इशारा किया।

​कुछ ही देर में शमा रोशन हुई और निज़ामत ने मेरा नाम पुकारा—हिंदी ग़ज़ल की जानी-मानी शोधकर्ता और शायरा के रूप में।

​मैं मंच पर पहुँची। माइक संभाला। न कोई आडंबर, न कोई दिखावा। जैसे ही मेरे लफ़्ज़ों ने सांस ली और ग़ज़ल के पहले शेर ने हवा में अपनी ख़ुशबू बिखेरी, पूरा सभागार 'वाह-वाह' और 'मुकर्रर' की सदाओं से गूँज उठा।

​काव्य-पाठ के दौरान मेरी नज़र उसी युवती पर पड़ी। जो चेहरा कुछ देर पहले उपेक्षा और अहंकार से भरा था, वह अब विस्मय और आनंद से झूम रहा था। उसकी तालियों की गूँज पूरे हॉल में सबसे अलग सुनाई दे रही थी।

​कार्यक्रम के समापन के बाद, जैसे ही मैं मंच से नीचे उतरी, वही युवती भीड़ को चीरती हुई मेरे पास आई। उसकी आँखें झुकी हुई थीं और हाथ जुड़े हुए थे।

​"मुझे मुआफ़ कर दीजिए, आपा..." उसकी आवाज़ में गहरा पछतावा और अगाध सम्मान था, "मैं लिबास के धोखे में आ गई थी। मुझे नहीं पता था कि इस सादगी के पीछे इतनी बड़ी फ़नकार छुपी है।"

​उसने बड़े काँपते हाथों से मेरे साथ एक सेल्फ़ी ली। और फिर, जब मैं वहाँ से जाने के लिए आगे बढ़ी, तो वह वहीं खड़ी होकर मुझे इस तरह निहार रही थी जैसे कोई ज़मीन पर खड़ा इंसान दूर खुले नीले आकाश की अनंत ऊँचाई को देख रहा हो।


- डॉ. प्रीति सुमन 

  सीतामढ़ी, बिहार



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