लरचें डारि-लता कतहूँ, अरु फल-कुँच कतौ,
मोतियन-सन झलकें।
छिछनाई गिरें कोइना कतहूँ, महुआ तरु नयन रिझावहिं, पुलकें।
उपवन माहिं बहै पुरवाई, हिलें तरु-पात ज्यूँ नारि की अलकें,
ऋतु बसंत छिटकावत रसवंती, मदमातल रस में तरुवर महकें।
पल्लव में भकजोन्हिया लिपटे, अनल-जोत-सन भक-भक भभकै,
आकुल देहिया ले फिरै विरहनी, मदरस-कंचुकी किरकै दहकै।
कस्तूरी चाहन जस हिरनी भटकै, वन-उपवन हर ठौर ठिठकै,
कजरारे नयन ठगे-से रहें, ठहरें जस काम-कमान-सी पलकें।
कँगना कलाई रहें कनके, गोड़ गोड़हरा, कड़ा संग ठनकें,
नकबेसर रहि-रहि ओंठवा चूमे, झम-झम झमकें झुमके झूमें।
टड्डा, बाजूबंद, माँग-टीका चमकै, हिय हुमेल हँसि हँसुली फुदकें,
झरि-झरि फूलि महावरि चूमे, रसि उड़ेरि मधुर रस छिरकें।
कामिनी शयनागारि क आस करै, कटिबंध कसै, कुहुकन कुलकें,
विरहिन मन-पीर कहै कइसे, अँचरा मुख डारि, भरि अँसुवन सिसकै।
बैरिन भई निंदिया, बिछिया ताकै, कब अइहैं पियवा हियवा हुटकै,
झुँझकै झुँझनाई, झुझुक मन झिड़कै, पुनि पाँति मिलै विहँसैं थिरकै।
- चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन"
बेनीगंज, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)
कार्यक्षेत्र/वृत्ति: वाणिज्य कर विभाग से सेवा-निवृत्त
प्रमुख एकल संकलन (17+ पुस्तकें): जगद्गुरु शंकराचार्य, महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती (काव्यांजलि एवं चित्रावली), वैदिक संध्या हवन, वंदे भारत मातरम्, सरयूपारीण भोजपुरी साहित्य एवं लोक संस्कृति (दो भागों में), उड़ान, निर्झरणी, लोक नाट्य शैली—नौटंकी, साहित्य अउर लघु कथायें, यज्ञात्मा श्री विश्वकर्मा आदि।
प्रमुख साझा संकलन: विश्वकर्मा साहित्यकार श्रेष्ठ रचनाएँ, मंदाकिनी, स्वर्णिम धरा, दीप साझा काव्य गागरी, भागीरथी, बइठकी, स्वर्ण संदेश आदि।
सम्मान व उपलब्धि
राष्ट्रीय स्तर एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर (नेपाल) पर अनेक प्रतिष्ठित मंचों और संस्थानों द्वारा साहित्य एवं समाज सेवा के लिए 'सम्मान पत्र' व उपाधियों से अलंकृत।