हाय!
मृत्यु का
तांडव जारी।
फटा ग्लेशियर
वहाँ अचानक,
फिर आया
सैलाब भयानक।
अफ़रातफ़री
मची अजब-सी,
तब हैरत भी
आँख पसारी।
रोता बचपन
पेट पकड़ के,
लाशें बहतीं
हाय अकड़ के।
त्राहिमाम
हर ओर मचा है,
साँसों पर
जीवन है भारी।
अपनों से
कितने विमुख हुए,
कितने ही
दर्द के सम्मुख हुए।
रोना-हँसना
तक भूले सब,
प्राण-रक्षा की
मारामारी।
दहशत में
सब पल-पल जीते,
खारा जल
पल-प्रतिपल पीते।
मौत निष्ठुर हो
वार किया,
बिना किसी
चाकू या आरी।
— साधना कृष्ण
(वैशाली, बिहार)