मौत का खेल (छंदमुक्त) - अश्वनी अम्बुज

लगभग बीस फीट ज़मीन से ऊँचाई,
बीस फीट खंभों की लंबाई,
बीच में बंधी रस्सी, इतनी ही रस्सी की लंबाई।

वह नन्ही मासूम, जिसकी उम्र मात्र पाँच बरस!
"बाबूजी! दिखाएगी यह कमाल,
यह लड़की रस्सी पर चलेगी,
यह लड़की नाचेगी रस्सी पर,
थाली पर पैर रख, साँसों को ज़िंदा रख,
चलती चली जाएगी बाबूजी!"

मैं हतप्रभ! नन्ही लड़की रस्सी पर
चलती जा रही थी,
लोगों की साँसें जैसे थमी जा रही थीं।

गाना शुरू हुआ—
"जब तक है जान जाने-जहाँ मैं नाचूँगी..."
लड़की रस्सी पर ठुमके लगा रही थी।

कैसा है यह मौत का खेल!
कितनी ज्वलंत है, कितनी जीवंत है पेट की आग!
बाबूजी! सिर्फ़ दो रुपये खेल के वास्ते,
सिर्फ़ दो रुपये पेट के वास्ते।
दिन भर में कुल जमा चालीस रुपये!

"छी सत्यानाशी! लड़खड़ाते कदम!"
झोपड़ी में बाप का फिर ज़ोरदार चांटा!
"दिन बेकार कर दिया करमजली ने,
पौआ भी नहीं आएगा इतने कम में!"

मैं हतप्रभ!
ज़िंदगी और मौत के इस खेल में...

— अश्वनी अम्बुज
     मध्य प्रदेश 
(काव्य-संग्रह: सुलगती सिगड़ियाँ)


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