चाहे जितनी मस्त हो हयात, गुज़र जाएगी,
ख़ुशनुमा अगर हो चाँदनी रात, गुज़र जाएगी।
सुबह लेकर आएगी कोख में रंगी किरणें,
बाद उसके दर्द की यह बरसात, गुज़र जाएगी।
धीरे-धीरे चलती रहे ज़िंदगी सबकी यूँ ही,
हो भले खट्टी-मीठी बात, गुज़र जाएगी।
मिलते हैं नसीबों से, बिछड़ते हैं नसीबों से,
चलते-चलते जो मिली सौगात, गुज़र जाएगी।
कैसे-कैसे सपने और कैसे-कैसे लोग देखे,
वक़्त पर छोड़ दिली हर बात, गुज़र जाएगी।
यह रेला हम इंसानों का न जाने कहाँ चला,
दिल में मस्ती लिए यह बारात, गुज़र जाएगी।
— संजय पवार
पुणे, महाराष्ट्र