तुम कहती हो तो! (कविता) - डॉ. राम प्रमोद मिश्र

'समय है अभी', कुछ और जी लो,
निष्ठुर निवेदन या है आदेश तुम्हारा?
बड़ा विकट यह कूट-प्रश्न है,
जान न पाया कभी यह जग सारा।

तुम कहती हो तो, जी लेते हैं,
घटती साँसों को गिन लेते हैं।
जीवन मधुर रसपान कब रहा,
वेदना का विष ही पी लेते हैं।

तुमसे मिलन एक अटल सत्य है,
यही इस नश्वर काया का लय है।
अमर आत्मा पर फिर भी भय है,
यह भी जीवन का अद्भुत विस्मय है!

स्पंदन, स्नेह और प्रेम का बंधन,
गहराता ही गया मोह और माया।
संवेगों के शतरंज में उलझा मानव,
जीवन पाकर भी जी नहीं पाया।

भय कैसा तुममें समा जाने में?
कैसे चुनूँ पथ तुम तक आने में?
तय कर रखे तुमने पथ पीड़ा के,
दारुण दुःख यही तुमसे मिलने में!

तुम अरूप, अदृश्य, अस्पृश्य तो भी,
चेतन-चिंतन का अमर सत्य हो।
असंभाव्य है अस्वीकरण तुम्हारा,
क्योंकि मृत्यु! बस तुम्हीं अमर्त्य हो।


— डॉ. राम प्रमोद मिश्र 
     लखनऊ, उत्तर प्रदेश 

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