मन के प्रभात (कविता) - विकास वर्धन मिश्र

मेरे मन के मधुरिम प्रभात,
जगते जीवन के मृदुल प्रात!
जगमग नूतन प्रसार लेकर,
आओ उद्यत विचार लेकर।

ढलते सूरज-सा सांध्य-प्रहर,
तम फैल रहा मेरे अंतर।
चहुँ ओर अशेष अँधेरा है,
विस्मय का बना बसेरा है।

तुम राग नया लेकर आओ,
मस्तिष्क-पटल पर छा जाओ।

वर्षों से खिन्न, विकल मन को,
टूटे, मुरझाए उपवन को,
नव प्राण-प्रकल्प दिलाया है,
हर बार विकल्प दिलाया है।

नव जीवन का उल्लास भरो,
निज पौरुष पर विश्वास करो।
उद्यम से जीतो जीवन को,
जीवन के घोर, प्रबल रण को।

- विकास वर्धन मिश्र 
 सहरसा, बिहार 

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