जीवन एक कसौटी (कविता) - डॉ. राम प्रमोद मिश्र

दुनिया ने न जाने क्या कहा होगा,
उसने भी न जाने क्या सुना होगा!
हुआ कुछ भी हो वहाँ मगर,
रोया वह जी भरकर ज़रूर होगा।

भला कब माँगा सारा स्वर्ग उसने,
जी लेने के सुख ही तो माँगे थे!
निष्ठुर नियति ने वह भी न दिया,
अभागा है! तब सबने कहा होगा।

चाहा उसने भी कि स्वप्न उसके पूरे हों,
पर टूट गया कोशिशें सारी करके!
लुट गया अपने भोलेपन के कारण,
समय के 'दाँव' न समझ पाया होगा।

भूख और भावनाओं के द्वंद्व में,
तय था विजय भूख की ही होगी!
कहीं छिन न जाए यह 'विजय' उससे,
कितने समझौतों पर शीश झुकाया होगा।

पाप और पुण्य भला वह क्या जाने,
अनासक्त वह बस श्रम करता रहा!
मृत्यु का भय उसे कभी क्या होता,
अपनी ज़िंदगी से वह ज़रूर डरा होगा।

उन्होंने समझाए उसे अध्याय अध्यात्म के,
जो खुद न समझे ज़िंदगी क्या है!
कैसे समझता वह भेद ये गहरे,
विवश हो तब किसी को उसने पूजा होगा।

तलाशता रहा वह 'अपनों' के कंधे,
मस्तक रख रोना चाहता था वह!
अपने कब 'अपने' हुए विपदाओं में,
कोई पराया ही 'अपना' हुआ होगा।

कभी साँसें उसकी भी थम जाएँगी,
धड़कनें भी कभी तो रुक जाएँगी!
इनके थमने और रुकने तक भला,
मर-मरके कैसे वह जिया होगा?

बस राख ही अवशेष नहीं रहती,
देह के भस्म हो जाने के बाद!
उसकी यादों और उसके स्वप्नों को,
क्या किसी ने कहीं संजोया होगा?


— डॉ. राम प्रमोद मिश्र
(एल्डिको उद्यान-2, रायबरेली रोड, लखनऊ)

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